Saturday, July 30, 2005

उधारीकरण में उधड़ी कामगारों की खाल

गुडगांव की होण्डा मोटर साइकिल ऎड स्कूटर इंडिया के एक हज़ार से ज़्यादा कर्मचारी २५ जुलाई को उदारीकरण के घिनौने स्वरूप का शिकार बने. पूंजीवाद के सरमायेदारों ने उस काले सोमवार को इन कर्मियों की खालों को जमकर उधेडा. इसी दिन दुनिया ने देखा कि कैसे चन्द उद्योगपतियों के इशारे पर प्रशासन तांडव करता है. कैसे श्रम शर्मसार किया जाता है. कैसे हमारे राजनेता गरम तवों पर रोटियां सेंकते हैं. पहले कंपनी ने कर्मचारियों के पेट पर लात मारी फिर वर्दीवाले गुंडों ने इनको पटक-पटककर मारा. पांच सौ से ज़्यादा प्रदर्शनकारी ग़िरफ्तार हुए, इनमें नौ (पुलिसिया रिपोर्ट के मुताबिक़) पुलिसवाले भी शामिल हैं. कर्मियों ने पहले पुलिस की जीप जलायी फिर पेट्रोल और डीज़ल से चलने वाली इस जीप की क़ीमत मज़दूरों के ख़ून से चुकाई.
मांग सिर्फ़ इतनी थी कि ये कर्मचारी अपने ५४ साथियों के अधिकारों की बात कंपनी मैनेजमेंट के सामने उठा रहे थे. फैक्ट्री में पहले कोई यूनियन नही था. कामगारों ने यूनियन बनाने की बात उठाई तो लेबर डिपार्टमेंट ने मान्यता देने से इंकार कर दिया. यह मामला प्रधानमंत्री तक गुहार लगाने तक पहुंचा. याद रहे ये आंदोलन पिछले तीन महीनों से जारी था. इससे पहले भी तक़रीबन पांच हज़ार श्रमिक शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर चुके थे. भूख हडताल भी शुरू की और इस दौरान एक कर्मी शहीद भी हुआ. किसे फ़िक्र हुई ?
इस दौर में हम मीडियाकर्मी फ़िक्रमंद हुए- मल्लिका के एमएमएस की ख़बरों से, आतंकवादियों की अरसे तक शरणस्थली रही लंदन के बम धमाकों से, दाउद कुनबे की शान-शौकतभरी शादी में आने-जाने वालों की ख़बरों से. किसे फ़िक्र हुई इन ख़बरों से कि राजधानी की नाक के नीचे एक बहुराष्ट्रीय कंपनी खुले आम श्रम क़ानूनों का उल्लंघन कर रही है. अलबत्ता हम फ़िक्रमंद हुए कि लंदन के एक टेबलायड "सन" ने ख़ुलासा किया है कि इसी गुडगांव का एक काल सेंटर ग्राहकों की गोपनीय जानकारी को सार्वजनिक कर रहा है. इन ख़बरों का भोंपू बजाने वाले टीवी चैनलों ने क्या ये सोचा कि इस ख़बर से (बाद में निराधार निकली) वे देश के उन लाखों नौजवानों के बीच कैसी दहशत फैला रहे हैं जो इन काल सेंटरों में काम करते हैं? क्या हम जाने - अन्जाने ब्रिटिश मीडिया के हाथों नहीं खेले गये जो हमेशा आउटसोर्सिंग का विरोध करते आया है?
अब उन ख़बरों को देखे जो ख़बर ही न बन सकीं - देश के श्रम क़ानून में बदलाव किया जाने वाला है. इसके मुताबिक़ निजी क्षेत्रो को अपने यहां कामगारों को ता- उम्र काम पर रखने की अनिवार्यता ख़त्म होगी, केंद्र सरकार ये बदलाव कर राज्य सरकारों को आगे के संशोधनों के लिए भेजेगी. राज्य अपने मुताबिक़ इसमें फ़ेरबदल के लिए तैयार और ज़िम्मेदार (?) होंगे. श्रम विभाग के आंकडे बताते हैं कि देश में असंगठित क्षेत्र के कामगारों की तादाद मे इज़ाफ़ा हो रहा है. कामगार जो पसीना बहाकर कमाया जो पैसा सरकार के जीपीएफ़ (कर्मचारी भविष्य निधि) में जमा कराता है उसे शेयर बाज़ार मे दांव पर लगाने का हक़ सरकार को किसने दिया? यही जारी रहा तो आगे इन लाखों- करोडों मज़दूर - कामगारों का मुस्तक़बिल क्या होगा? "लोक कल्याणकारी राज्य" का हमारा संवैधानिक संकल्प याद दिलाने वाला कौन होगा?
विडंबना है कि आज वामदल उन लोगों के साथ हैं जो इस उदारीकरण के पुरोधा माने जाते हैं. चंद सरमायेदारो की पूंजी में हो रहा दूगुना- तिगुना इज़ाफ़ा पूरे देश की माली हालत का थर्मामीटर बन जाता है. ( इंडिया टुडे का ८ अगस्त का अंक पढें). हमने क्या ये सोचा कि देश के हर नागरिक की आय में दूगुना-तिगुना इज़ाफ़ा क्यों नही हुआ? इसी दौर में ये न्यायपालिका की महिमा रही कि हडताल को ग़ैरक़ानूनी करार दिया जाता है. निजीकरण और उदारीकरण के जिस दौर से हम गुज़र रहे हैं वहां इसका और भी ज़्यादा विद्रूप चेहरा दिखाई देना अभी बाक़ी है. १९९१ में जो वैश्विक व्यापार के लिए खिडकियां खोलने की बात करते थे वे इस दफ़ा पूरा दरवाज़ा खोल चुके हैं. नवउदारवाद के राग आलाप रहीं तीसरी दुनिया के देशों की सरकारों पर चौ-तरफ़ा दबाव है.
आप निश्चिंत हैं, शायद खुश भी क्योंकि आग आपके घरों तक नही पहुंची है. इन हालत में दुष्यन्त कुमार का अशआर याद आता है-
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए.
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए.
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए.
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए.