Saturday, June 24, 2006

वे दो 'पच्चीस जून'


२५ जून का यह दिन ऐतिहासिक है. कई मायनों में. हर दिन की तरह इसका भी सूरज उगता है किसी और दिन की ही तरह.. लेकिन शाम ढलते-ढलते यह दिन एक नया धर्म दे गया. पुराने धर्म को अलविदा कह गया ये दिन.. लोगों को नए सितारे दे गया. साथ ही आधी रात बीतते तक देश के राजनीतिक इतिहास पर कलंक छोड़ जाता है यह दिन. देश के लोकतांत्रिक इतिहास का काला अध्याय बन जाता है और सोचने पर मजबूर करता है यह दिन.. कि कैसे पाशविक बहुमत से चुनी सरकार भी लोकतंत्र के लिए घातक हो सकती है. दो दिनों के बीच की इसी काली रात पर देश की दो उच्च संस्थाओं ने लोकतंत्र का गला घोंटने का अक्षम्य अपराध किया था. तो इसी दिन ने गांवों-शहरों को नए खेल से परिचित कराया था जो बाद में बहुतों की रगों में उतरता चला गया.

लोकतंत्र पर ग्रहण
बात २५ जून की कर रहा हूं. १९७५ में २५ और २६ जून की दरम्यानी रात को इंदिरा गांधी की सरकार राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद से आपातकाल के दस्तावेजों पर दस्तख़त करा रही थी. इंदिराजी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश से बिफ़र कर समूचे लोकतंत्र को अपने कब्ज़े में ले लिया था और अगली सुबह देश का आम आदमी जब उठा तो उसके मुंह पर ताला लगाया जा चुका था. जेल इंदिराविरोधी नेताओं से ठूंसे जा रहे थे. संजय और उनकी चौकड़ी को मानो स्वेच्छाचारिता का लाइसेंस मिल गया. गांवों-शहरों में पुलिसिया अत्याचार कहर बरपा रहा था. कलाकार हो या साहित्यकार या फिर पत्रकार.. सबके सब मारे भय के ख़ामोश थे या फिर ज़ुबां खोलने की सज़ा भुगत रहे थे. मैं बहुत छोटा था.. पिता जी पुलिस में थे और व्यवस्था के अहम हिस्से थे. उनकी नज़रों में ये अनुशासन पर्व था. मेरी नज़रें और नज़रिया इस लायक नहीं थे कि कुछ समझ सकूं और कह सकूं. किंतु आगे मैं अपने पिता को यह मनवाने में कामयाब हुआ कि इंदिरा जी ने जो किया वो कई मायनों में ग़लत था.

'धर्म' का उदय
आठ साल बाद यह दिन फिर आया लेकिन इस दफ़ा अपने साथ यह क्रिकेट नाम का धर्म लेकर आया था. ब्रिटिश सामंतवादी शासन का प्रतीक बने इस खेल के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ने वाले तब ख़ामोश हो गए जब कपिल देव के दल ने अंग्रेज़ों की धरती पर इसी दिन विश्वकप उड़ाया. यह भारतीय क्रिकेट जगत का स्वर्णिम दिन था. मैं छोटा था लेकिन क्रिकेट का दीवाना. उस दुपहरी को हमारे खिलाड़ी लॉर्डस के मैदान पर उतरे और श्रीकांत के ३८ रनों के साथ साठ ओवरों में १८३ रन बनाएँ. लगातार तीसरी बार विश्वकप जीतने के ख़्वाब के साथ उतरी वेस्टइंडीज़ को भारी आंका जा रहा था. कप्तान कपिल देव और मध्यगति के गेंदबाज़ मोहिंदर अमरनाथ की गेंदबाज़ी के आगे वेस्टइंडीज़ के ख़िलाड़ी एक-एककर पेवेलियन चलते गए. वहां विकेट गिरते और इधर मुहल्ले की इकलौती टीवी के सामने दरी पर बैठी हम बच्चों की टोली बल्लियों उछल जाती. आख़री विकेट माइकल होल्डिंग का गिरा. मोहिंदर ने उन्हें पगबाधा आउट किया और दौड़ पड़े स्टम्प उखाड़ने. मैं उस झण को भूल नहीं पाया. भला कौन भूलना चाहेगा. सारे खिलाड़ी पेवेलियन भागे और उनके पीछे भागे इंग्लैंड में बसे भारतीय. कप्तान कपिल के हाथों चमचमाता विश्वकप और साथ में गावस्कर, मदनलाल जैसे बेहतरीन खिलाड़ी. अब तक वो कहानी दोहरायी नहीं जा सकी. वो निसंदेह महान खिलाड़ी थे. बिना चूके एक ही झटके में उड़ा ले गए थे वो प्रूडेंशियल वर्ल्ड कप और सारी दुनिया देखती रह गई. ठीक एक साल पहले दिल्ली के एशियाड फ़ाइनल में हॉकी की पराजय से निराश हो चुके लोगों के लिए यह बरसों के अकाल के बाद आई बारिश की पहली फुहार के मानिंद था. सब हर्षित थे और फैल रहा था क्रिकेट नाम का नया धर्म. संयोग देखिए इसी तारीख को १९३२ में भारत ने इसी मैदान पर सबसे पहला अंतरराष्ट्रीय टेस्ट मैच खेला था.

Monday, June 19, 2006

ताकि दुकानदारी चलती रहे..


अमरनाथ गुफ़ा के तीर्थयात्रियों के साथ धोखे की ख़बरें इन दिनों सुर्ख़ियों में हैं. मेरे परिचित जो हाल ही में अमरनाथ गुफ़ा के दर्शन कर आए हैं, ने यह भेजा है. तस्वीरों में साफ़ तौर पर तो नहीं दिख रहा कि शिवलिंग को किन्हीं व्यक्तियों ने बनाया है. किंतु बातचीत में उनका दावा था कि उसी दौरान वे वहां पहुंचे थे जब तिरपाल डालकर लिंग पर बर्फ चढ़ायी जा रही थी. हां ये तस्वीरों में ज़रूर दिख रहा है कि कैसे यहां दो व्यक्ति जूते पहने हुए विचरण कर रहे हैं. मेरे परिचित का कहना है कि उन्होंने जब वहां मौजूद कर्मियों से पूछा कि तिरपाल डालकर क्या किया जा रहा था तो जवाब मिला कि तुम्हें इससे क्या मतलब. इन परिचित ने एक अन्य एमएमएस बनाने की कोशिश की थी किंतु वहां मौजूद कर्मचारियों ने उनका मोबाइल छीनकर तस्वीरें मिटा दीं. अभी कुछ जानकारी और भी हैं. जब मिलेंगी तो भेजूंगा.
भूविज्ञानियों का कहना है कि जिस सुरंग से पानी रिसकर बर्फ बनता था वो अब बंद हो चुकी है. ज़ाहिर है ऐसे में दुकानदारी को कैसे बंद किया जा सकता था. लिहाज़ा हाथ से ही लिंग बनाकर काम चलाया गया. तथ्य है कि दर्शन के लिए पांच लाख यात्री आते हैं. अब यदि लिंग ही दिखाई नहीं देगा तो राह में पसरी दुकानदारी का क्या होगा. आस्था और व्यापार का अनोखा घालमेल साफ़ दिख रहा है. अब कौन समझाए कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते बड़े-बड़े ग्लेशियर पिघल रहे हैं तो ये कैसे बच सकता है.
पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहाड़..

Wednesday, June 14, 2006

काश, मैं राष्ट्रद्रोही होता..

हंस में प्रकाशित राजेंद्र यादव का लेख यहां पढ़ें. लेख में उद्धृत कार्ल मार्क्स का मूल पत्र यहां पढ़ सकते हैं.

Monday, June 12, 2006

ख़बरदार अगर न्यूज़ चैनल देखा तो...

क ज़माना था.. उन दिनों अपन ने जवानी की दहलीज़ पर क़दम रखा ही था कि देश के आसमां में सेटेलाइट चैनलों ने अटैक शुरू कर दिया. इन्हीं दिनों अमेरिका इराक़ पर अटैक कर रहा था और अपने इलाक़े में दो-तीन चैनल अटैक कर रहे थे. दक्षिणपंथी इसे सांस्कृतिक आक्रमण की संज्ञा देते हुए इनसे बचने की समझाइश दे रहे थे. देश के चारों महानगरों से हज़ार-डेढ़ हज़ार किलोमीटर दूर अपने कस्बे राजनांदगांव में सबसे पहले एटीएन आया और फिर ज़ी टीवी. दुष्टदर्शन की दुष्टता से परेशां हो चुके लोगों के लिए तो मानो मनोरंजन का पिटारा ही खुल गया. अपन हमेशा ख़बरें रेडियो पर सुनने और उनको प्लास्टिक की तरह चबा-चबाकर बहस करने का चर्वणसुख अपने मित्रों के साथ लेते थे. यही प्लास्टिक अपना ड्रग्स होता था.

मीडिया शहंशाह रूपर्ट मर्डोक के स्टार नेटवर्क के कंधे पर बैठकर ज़ी आया, देशी आइटम लेकर एटीएन आया और इन्हीं के साथ बीबीसी टीवी भी आ गया. अपनी आंखें तो तब भौंचक रह गईं जब पहली बार एक ऐसा चैनल देखा जिसमें गरमागरम सीन दिखाई दिए. नाम था एमटीवी. किसी अंग्रेज़ीदां ने बताया कि ये अमेरिका और पश्चिमी मुल्क़ों में युवाओं के बीच बहुत पसंद किया जाता है. वहां के युवाओं की आवाज़ है. अपन ने सोचा चलो अच्छा है अपनी आवाज़ तो ये बाद में सुनेगा लेकिन इसकी पहले सुन-देख लेते हैं. इसे देखकर अपना ड्रेसिंग सेन्स बढ़ने लगा. सिंगल या टू पीस क्या होता है, किसिंग, स्मूच वगैरह-वगैरह. सैक्स की शब्दावली अपने को यहीं समझाई गई. बडे़-बुज़र्गों की नज़रों से छुप-छुपाकर एमटीवी देख ही लेते थे. फिर चार-पांच साल और बीत गए. स्कूल से निकलकर कॉलेज में आ गए. तब तक पंद्रह-बीस चैनल धमक चुके थे. दक्षिणपंथी सरकार में आ गए और जिन चैनलों को वो सांस्कृतिक आक्रमण कहते थे उसे उन्होंने सांस्कृतिक आदान-प्रदान कहना शुरू कर दिया. चैनल चलते रहे. अपने बड़े-बूढ़ों की सख्त हिदायत होती थी कि ख़बरदार अगर टीबी-सिक्स, फ़ैशन टीवी या एमटीवी देखा. बुज़ुर्ग कहते थे- बेटा न्यूज़ चैनल देखा करो. कुछ सीखों, समझों, ज्ञान बढ़ाओं- वही काम आएगा कैरियर में.

अब ज़माना बदल चुका है. अब एक- दो नहीं तीन दर्ज़न न्यूज़ चैनल हमारे टीवी पर दिखाई देते हैं. मेरी तरह ही अब बड़े-बूढ़े इन चैनलों को देखने की बातें नहीं करते. कर भी नहीं सकते क्योंकि कौन लफ़ड़ा पाले? उन दिनों कोई हॉट सीन(कुनकुना कहूं तो अच्छा होगा) अगर टीवी के परदे पर आ गया सब मुंह फेर लेते थे या थोड़ी देर के लिए किसी दूसरे कमरे में झाकर अपनी झिझक मिटा लिया करते थे. अब हमे एमटीवी या किसी हिन्दी फ़िल्म में आ रहे उन कुनकुने सीनों के साथ तक़लीफ़ नहीं. अब तो न्यूज़ चैनलों के साथ मुश्किल हो जाती है. पता नहीं कौन-सा चैनल कब हॉट एमएमएस दिखा दे. मल्लिका शेरावत को इतनी चिंता नहीं हुई जब उनके छद्म नाम का एमएमएस पोर्न वीडियो के मार्केट में आया. लेकिन चैनलवालों ने अपनी पूरी ताक़त झोंककर पता लगा ही लिया कि वो मल्लिका नहीं बल्कि लैटिन पोर्न स्टार लॉली है. तब तक ज़मानेभर को डीपीएस कॉड के ज़रिए बताया जा चुका था कि हॉट एमएमएस क्या होता है. बड़ी चतुराई से इन्हें ऐसे मोज़ेक करके दिखाया गया कि ना छुपे और ना ही दिखे. दूसरे चैनल ने सुबह-सुबह शेन वार्न की काम-क्रीड़ा की सचित्र ख़बरें चला दीं. करीना-शाहिद के चुंबन के सीन टीवी पर ऐसे चल रहे थे मानो किसी राष्ट्रीय समस्या का ज़िक्र हो रहा हो. हाल ही में राखी सावंत ने ठुमके लगाए और वे इन चैनलों की नज़रे जम गईं. तीन-चार चैनल तो राखी-मीका के बीच छिड़े किसिंग विवाद को सुलझाने के लिए पंचायत बिठाने लगे- मानो ये मामला ना सुलझा तो देश संकट में धंस जाएगा. सुबह से लेकर देर रात तक सबके-सब इसी दिमाग़ी कसरत में जुटे थे कि इस गंभीर समस्या का हल कैसे निकले. सोचता हूं कि जब शेन और उनकी प्रेमिकाओं, करीना-शाहिद को आपत्ति नहीं तो इन लोगों के पेट में क्यूं दर्द होता है. अपने छोटे से शहर में एक इलाक़ा हुआ करता है जहां अक्सर पी-खाकर लोग आपस में भिड़ जाते हैं. दिमाग़दार लोगों की समझाइश होती थी कि उनकी लड़ाई में मत पड़ो. जब उतर जाएगी तो यही लड़ने वाले सुबह साथ प्रेमालाप करते दिखाई देंगे. हैरानगी होती है कि न्यूज़ चैनलवाले इन इलाक़ों में अब अपनी नाक घुसा बैठे हैं.

सोचता हूं कि पिताजी क्या सही कहते थे? चलिए आप न्यूज़ चैनल बंद कीजिए.. वरना आपके बड़े-बुज़ुर्ग कहेंगे - ''ख़बरदार न्यूज़ चैनल देखा तो खैर नहीं.''

Sunday, June 11, 2006

बाज़ार में ख़र्च होते बिग बी

ख़बरें फिर गर्म हो गईं अमिताभ के आयकर संबंधी विवादों की. लड़ाई समाजवादी पार्टी और सत्तारूढ़ कॉग्रेस की लेकिन निशाने पर अमिताभ हैं. यहां वे अर्धराजनीतिक व्यक्तित्व दिखाई देते हैं. उनकी अर्धांगिनी अमिताभ जया बच्चन सपा से हाल में दोबारा सांसद बनीं हैं. अमिताभ का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है- ये साफ़-साफ़ नहीं कहा जा सकता. सत्ता के गलियारों में व्यापारियों का आना-जाना लगा रहता है. व्यापार के रास्ते में आने वाली बाधाओं को दूर करने के नुस्खे इन्हीं गलियारों में ढूंढे जाते हैं.
अमिताभ की अभिनय प्रतिभा पर सवाल खड़े करना बचकाना होगा लेकिन अमिताभ के साथ दो दशक तक त्रासदी यही रही कि उनकी छवि अभिनेता अमिताभ से बड़ी होती गई. वे व्यवस्था में पिस रहे आम आदमी का प्रतिनिधि नहीं कर पाए. वे एंग्रीमैन बन गए. प्रकाश मेहरा और मनमोहन देसाई ने अमिताभ को एंग्रीमैन की इमेज दी. नब्बे के दशकांत में अमिताभ गुमनामी के अंधेरे में खोते गए. दर्ज़नों हिट फ़िल्म देने वाले अमिताभ की फ़िल्में पिटती गईं.
अपने दोस्त राजीव गांधी के कहने पर उन्होंने राजनीति को गले लगाया था उसी राजनीति ने उनके दामन पर बोफ़ोर्स का दाग़ लगा दिया. इलाहाबाद चुनाव लड़ने से पहले अमिताभ ने सार्वजनिक जीवन में किसी तरह की वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं जताई थी. सामाजिक समस्याओं के समाधान की दिशा में उनका कोई निजी नज़रिया भी नहीं था. पॉलिटिशियन अमिताभ के रचनाकार राजीव थे. छब्बे जी बनने चले चौबे जी आख़िरकार दुबे बनकर लौटे. हालांकि बाद में ब्रिटिश कोर्ट के फ़रमान से दामन पर लगा बोफ़ोर्स का दाग़ मिटा लिया गया लेकिन तब तक अमिताभ राजनीति को अलविदा कह चुके थे.
देश में उदारीकरण का दौर शुरू हुआ और फ़िल्मी सितारों से लेकर खेल सितारें, यहां तक कि नेता तक ब्रांड में तब्दील होने लगे. अमिताभ को ब्रांड बनाने की पहली कोशिश एबीसीएल के तौर पर हमारे सामने आई. कंपनी और इसकी बनाई फ़िल्मों का भट्ठा बैठ गया. कहा गया कि बिज़नेसमैन बनने निकले अमिताभ को उनके ही रणनीतिकार ले डूबे. पहले मेहरा-देसाई एंग्रीमैन अमिताभ के रचनाकार थे. इन्हीं दोनों की आख़री दौर की फ़िल्मों में अमिताभ भी अंधेरे में डूब गए. फिर एबीसीएल की टीम ने उन्हें डुबोया. अमिताभ वित्तीय संकटों से जूझ रहे थे. इस दौर में अमर सिंह उनके साथ आए. कहा गया कि समाजवादी पार्टी के थैलीशाहों ने अमिताभ को संकटों से उबारा. अमिताभ का सिक्का फिर चल निकला.
जीवन के सांध्यकाल में अमिताभ आख़िरकार ब्रांड बन ही गए. नाम मिला 'बिग बी'. बिग बी दुनिया के बाज़ार में बिकने वाली हर चीज़ के साथ दिखाई देने लगे. जिन्होंने संकटों से उबारा वो दोस्ती के बदले बहुत कुछ लेते चले गए. बिग बी का बाज़ार सजा तो सियासत ने भी बदले में कुछ मांगा और बिग बी ने समाजवादियों के लिए भी मार्केटिंग की. ये अमिताभ के नए रचनाकार हैं. अमिताभ चुनाव चिन्ह लेकर साथ नहीं चले लेकिन चुनावों के दौर में सपा नेताओं के साथ नज़र आए. वे नेता नहीं हैं लेकिन नेताओं के साथ नज़र आए. वे किसान नहीं हैं लेकिन ज़मीन ख़रीदने के लिए किसान बने नज़र आए. वो सिगरेट नहीं पीते लेकिन सिगरेट पीते नज़र आए. सियासत से सितारों की दुनिया तक जैसा रचनाकार मिला वैसा अमिताभ नज़र आया. बाज़ार में ख़र्च होते अमिताभ यह तय नहीं कर सके कि ख़ुद वे क्या हैं.