Sunday, June 11, 2006

बाज़ार में ख़र्च होते बिग बी

ख़बरें फिर गर्म हो गईं अमिताभ के आयकर संबंधी विवादों की. लड़ाई समाजवादी पार्टी और सत्तारूढ़ कॉग्रेस की लेकिन निशाने पर अमिताभ हैं. यहां वे अर्धराजनीतिक व्यक्तित्व दिखाई देते हैं. उनकी अर्धांगिनी अमिताभ जया बच्चन सपा से हाल में दोबारा सांसद बनीं हैं. अमिताभ का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है- ये साफ़-साफ़ नहीं कहा जा सकता. सत्ता के गलियारों में व्यापारियों का आना-जाना लगा रहता है. व्यापार के रास्ते में आने वाली बाधाओं को दूर करने के नुस्खे इन्हीं गलियारों में ढूंढे जाते हैं.
अमिताभ की अभिनय प्रतिभा पर सवाल खड़े करना बचकाना होगा लेकिन अमिताभ के साथ दो दशक तक त्रासदी यही रही कि उनकी छवि अभिनेता अमिताभ से बड़ी होती गई. वे व्यवस्था में पिस रहे आम आदमी का प्रतिनिधि नहीं कर पाए. वे एंग्रीमैन बन गए. प्रकाश मेहरा और मनमोहन देसाई ने अमिताभ को एंग्रीमैन की इमेज दी. नब्बे के दशकांत में अमिताभ गुमनामी के अंधेरे में खोते गए. दर्ज़नों हिट फ़िल्म देने वाले अमिताभ की फ़िल्में पिटती गईं.
अपने दोस्त राजीव गांधी के कहने पर उन्होंने राजनीति को गले लगाया था उसी राजनीति ने उनके दामन पर बोफ़ोर्स का दाग़ लगा दिया. इलाहाबाद चुनाव लड़ने से पहले अमिताभ ने सार्वजनिक जीवन में किसी तरह की वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं जताई थी. सामाजिक समस्याओं के समाधान की दिशा में उनका कोई निजी नज़रिया भी नहीं था. पॉलिटिशियन अमिताभ के रचनाकार राजीव थे. छब्बे जी बनने चले चौबे जी आख़िरकार दुबे बनकर लौटे. हालांकि बाद में ब्रिटिश कोर्ट के फ़रमान से दामन पर लगा बोफ़ोर्स का दाग़ मिटा लिया गया लेकिन तब तक अमिताभ राजनीति को अलविदा कह चुके थे.
देश में उदारीकरण का दौर शुरू हुआ और फ़िल्मी सितारों से लेकर खेल सितारें, यहां तक कि नेता तक ब्रांड में तब्दील होने लगे. अमिताभ को ब्रांड बनाने की पहली कोशिश एबीसीएल के तौर पर हमारे सामने आई. कंपनी और इसकी बनाई फ़िल्मों का भट्ठा बैठ गया. कहा गया कि बिज़नेसमैन बनने निकले अमिताभ को उनके ही रणनीतिकार ले डूबे. पहले मेहरा-देसाई एंग्रीमैन अमिताभ के रचनाकार थे. इन्हीं दोनों की आख़री दौर की फ़िल्मों में अमिताभ भी अंधेरे में डूब गए. फिर एबीसीएल की टीम ने उन्हें डुबोया. अमिताभ वित्तीय संकटों से जूझ रहे थे. इस दौर में अमर सिंह उनके साथ आए. कहा गया कि समाजवादी पार्टी के थैलीशाहों ने अमिताभ को संकटों से उबारा. अमिताभ का सिक्का फिर चल निकला.
जीवन के सांध्यकाल में अमिताभ आख़िरकार ब्रांड बन ही गए. नाम मिला 'बिग बी'. बिग बी दुनिया के बाज़ार में बिकने वाली हर चीज़ के साथ दिखाई देने लगे. जिन्होंने संकटों से उबारा वो दोस्ती के बदले बहुत कुछ लेते चले गए. बिग बी का बाज़ार सजा तो सियासत ने भी बदले में कुछ मांगा और बिग बी ने समाजवादियों के लिए भी मार्केटिंग की. ये अमिताभ के नए रचनाकार हैं. अमिताभ चुनाव चिन्ह लेकर साथ नहीं चले लेकिन चुनावों के दौर में सपा नेताओं के साथ नज़र आए. वे नेता नहीं हैं लेकिन नेताओं के साथ नज़र आए. वे किसान नहीं हैं लेकिन ज़मीन ख़रीदने के लिए किसान बने नज़र आए. वो सिगरेट नहीं पीते लेकिन सिगरेट पीते नज़र आए. सियासत से सितारों की दुनिया तक जैसा रचनाकार मिला वैसा अमिताभ नज़र आया. बाज़ार में ख़र्च होते अमिताभ यह तय नहीं कर सके कि ख़ुद वे क्या हैं.

5 Comments:

Blogger Jagdish Bhatia said...

स्वागत है आपका।
आशा है कि अमिताभ से शुरुआत करने से आपके चिट्ठे की भी कुछ ब्रांड्वेल्यु हो जयेगी।

8:56 AM  
Anonymous Tarun said...

वो खुद क्‍या हैं? शायद पैसे कमाने की मशीन ;)

10:21 AM  
Blogger Srijan Shilpi said...

बहुत अच्छा लिखा है नीरज भाई आपने । किसी अख़बार के संपादकीय की तरह सुगठित और सटीक शैली में लिखा गया है यह लेख । आप इसी तरह लेखन जारी रखिए अपने चिट्ठे पर ।

10:06 PM  
Anonymous Anonymous said...

To endorse anything one must use that product. But according to me no endorser is using the product they are endorsing. Amitabh Bachchan is the undisputed superstar and his charismatic personality may give short term boost to the sales. But in long run it's only product feature and its attributes which contributes sales.

As far as Bachchan's endorsement is concerned, he is only making money by encashing his worth. From consumer's point of view he is luring them with his presence not with the attributes of product. Whereas from the point of view of the company, it gets immediate publicity and attention for its product.

In brief, we should not believe these endorsements and always remember "DIKHAVE PER NA JAO, APNI AKAL LAGAO"

Thnx Neeraj Ji
Yours
Krishna Das

6:55 AM  
Anonymous संजय बेंगाणी said...

बहुत खुब. अमिताभ को देखने का एक अलग दृष्टिकोण. सही हैं भीड्डू.

4:25 AM  

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