Wednesday, June 14, 2006

काश, मैं राष्ट्रद्रोही होता..

हंस में प्रकाशित राजेंद्र यादव का लेख यहां पढ़ें. लेख में उद्धृत कार्ल मार्क्स का मूल पत्र यहां पढ़ सकते हैं.

7 Comments:

Anonymous आशीष said...

राजेंद्र यादव का लेख अच्छा है लेकिन विसंगतियो से भरा है।
ये बात सही है कि अंग्रेज शाशन ने भारतिय समाज को एक नयी दिशा दी, एक नयी शाशन व्यव्स्था दी।
लेकिन यदि अंग्रेज भारत नही आते या १८५७ का विद्रोह उन्हे उखाड फेंकता तो हम जो आज है वह आज नही होते यह गलत है।
अंग्रेजो ने भारतिय ग्रामीण अर्थव्यव्स्था को नष्ट कर दिया, जो हमारे लिये सबसे नुकसानदेह साबित हुआ था। एक भारतिय गांव जो आत्मनिर्भर होता था , नष्ट हो गया!

हर क्रांति का एक नियत समय होता है, और उस क्रांति को कोई रोक नही सकता। विश्व इतिहास पर एक नजर डालिये स्पष्ट हो जायेगा। फ्रांस की राज्यक्रांति हो, या ब्रिटेन की राजशाही का प्रतिकातमक राजशाही बनना !
एक समय था फिलीस्तीन ने इजराइलीयो को मार भगाया था, पूरे देश को नष्ट कर दिया था। आज स्थिती उलट है...
चाणक्य ने भी टुकडो मे बंटे भारत को एक सूत्र मे बांधने का कार्य किया था, आज से २०० साल पहले...
और ये छूत अछूत, उंच निच का जो इतिहास है, ये ज्यादा पूराना नही है । ये मध्ययूगीन है।

शिवाजी कोई ब्राम्हण या क्षत्रिय नही थे, वे भी पिछडे वर्ग से थे...
ज्योतिबा फूले जिन्होने दलितो के लिये शिक्षा की ज्योति जलायी, माळी थे, दलित नही...
आंबेडकर जी को जिन्होने आगे बढने मे मदद की वे बडौदा नरेश गायकवाड थे..
मेरे कहने का मतलब सिर्फ यही है,क्रांति का जब समय आता है तो उसे कोई रोक नही सकता। इसे किसी नेता या शाशन कि जरूरत नही होती, ये स्वंयस्फूर्त होती है.. ये नेता खुद पैद करती है..
ये कुछ उस तरह है कि आप ये नही कह सकते की ग्राहम बेल नही होता तो टेलीफोन का अविष्कार नही होता ।

9:14 PM  
Blogger Sagar Chand Nahar said...

सही कहते है राजेन्द्र यादव जी, इसे राष्ट्रदोही की बकवास तो नहीं परन्तु एक अर्धविक्षिप्त का अनर्गल प्रलाप ही कहा जा सकता है।
एक बात समझ में नहीं आती सबको ले देकर आडवाणी और अन्य हिन्दू नेता ही क्यों नज़र आते हैं? किसी को हुर्रियत के देश द्रोही नेता, महबूबा मुफ़्ती जो खुले आम देश द्रोह की बातें करती हों, या अन्य धरमों के नेता नज़र नहीं आते या इन पर टिप्पणी करने की कूवत नहीं है?
नेपाल नरेश के बारे में ठीक कहा कि उन्होनें दिन दहाड़े अपने परिवार जनों की हत्या कर अपने आप को देश का राजा नियुक्त कर दिया, और सारी दुनिया से मानयता भी ले ली ।

10:49 PM  
Anonymous संजय बेंगाणी said...

नीरजजी चाणक्य वाली पंक्ति में " 200 साल के स्थान पर 2000 साल " लिख दें.
लेख प्रशंसा योग्य हैं.

11:18 PM  
Blogger Srijan Shilpi said...

कालचक्र सदैव गतिमान है। अंग्रेजों के उत्कर्ष का समय बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में व्यतीत हो चुका है। पिछली सदी का उत्तरार्द्ध अमेरिका के वर्चस्व का काल था। अगले पचीस वर्ष में चीन शायद सबसे अधिक प्रगति करने में सफल रहेगा। लेकिन 2025 के आसपास एक विश्वस्तरीय युद्ध होगा, जिसके बाद भारत एक बार फिर विश्व की सबसे बड़ी महाशक्ति बन कर उभर सकेगा। उसके बाद भारत का वर्चस्व शायद अगले 50-100 वर्षों तक बना रहे। अंग्रेजों के बुरे दिन शुरू होने ही वाले हैं। यही नियति का दस्तूर है। उत्थान और पतन का चक्र अनवरत जारी रहता है। लेकिन यह सब अपने आप नहीं होता है। मानव की समष्टिगत चेतना की धारा ही इसका रुख तय करती है, जिसे शक्तिशाली विचारशक्ति एवं इच्छाशक्ति से संपन्न महापुरुष नियंत्रित करते हैं।

11:53 PM  
Anonymous संजय बेंगाणी said...

1857 में अंग्रेजो को परास्त कर देते तो देश का क्या हाल होता, इसकी जो कल्पना कि गई हैं लगभग आज़ादी के समय अंग्रेज भी भारत के लिए वैसी ही कल्पना कर रहे थे. पर क्या वैसा हुआ?

6:25 AM  
Blogger अनुनाद सिंह said...

राजेन्द्र यादव मार्क्सवादी जूठन खाने और खिलाने के आदी हैं | उनके तर्क से जायें तो भारत को स्वतन्त्र ही नही होना चाहिये था | मैं राजेन्द्र यादव के विचारों को आत्महीनता से ग्रसित मस्तिष्क की बकवास कहना पसन्द करूँगा |

एक अत्यन्त अंतर्दृष्टिपूर्ण विचारधारा है जो मानती है कि हर काम के होने का एक समय होता है | न्यूटन ने कैलकुलस की नीव जरूर रखी, लेकिन हम भूल जाते हैं कि तब तक उसके लिये आवश्यक तैयारियाँ दूसरों ने कर रखीं थीं | अगर न्यूटन ने यह काम नहीं किया होता तो किसी और के द्वारा यह काम होता ; न्यूटन के आने का इन्तजार नही होता |

राजेन्द्र यादव भूल जाते हैं कि जेहाद और "क्रूसेड" कोई भारत की देन नहीं थी| वोल्टेयर ने अपने लेखों में रोमन कैथोलिक चर्च का कितना विरोध किया है, वहाँ कोई हिन्दू नहीं थे | प्रोटेस्टेन्ट आन्दोलन हिन्दू धर्म के विरूद्ध नहीं था | कौन नहीं जानता कि यूरोप में दासप्रथा अपने सर्वाधिक कुत्सित रूप में विद्यमान थी | यूरोप का वर्ग-भेद भारत के वर्ग-भेद से कम निन्दनीय कैसे है ? जो जीत गया उसमें सब गुण हैं/थे | समरथ को नहिं दोष गोसाईं |

भारतीय धर्म दुनिया का सबसे उदार और प्रगतिशील धर्म रहा है | हम तो शायद अपने "धर्म" का नाम भी नहीं जानते थे |मुसलमानों के आने के पूर्व धर्म के लिये लडाई की हम कल्पना भी नहीं कर पाते थे | ये बात अलग है कि मुसलमान और अंगरेज काल के अंधकार युग में उसमें स्थिरता आ गयी, भटकाव आ गया, नेतृत्वहीनता पैदा हो गयी और उसके कारण तमान सारी खामियाँ आ गयीं |

राजेन्द्र यादव को शायद पता न हो कि अंगरेजों के आधीन होने के पूर्व भारत विश्व की आर्थिक शक्ति था | कोई आविष्कार किसी जाति की बपौती नहीं है | जिस युग के आविष्कारों की राजेन्द्र गाथा गा रहे हैं , उस युग में भारत के लोग अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रहे थे | जो दिन-रात अपने जीवन को बचाने में संघर्षरत हो, वह विज्ञान क्या करेगा, टेकनालोजी क्या करेगा ?

मेरे विचार से हमारा सबसे बडा दोष यही रहा है कि हम शान्तिप्रिय रहे, अहिंसक रहना पसन्द करते रहे, आक्रामक नहीं हुए ; बस | चाहो तो इसे मेरे धर्म की कमजोरी कह लो |

12:41 PM  
Blogger अनुनाद सिंह said...

शायद राजेन्द्र यादव महान गाँधीवादी विचारक धरमपाल जी की गहन शोध पर आधारित पुस्तक "द ब्यूटिफुल ट्री" से परिचित नहीं हैं |

नेट पर कुछ सामग्री उपलब्ध है :

http://www.geocities.com/ifihhome/articles/sk003.html

8:51 AM  

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