Monday, June 12, 2006

ख़बरदार अगर न्यूज़ चैनल देखा तो...

क ज़माना था.. उन दिनों अपन ने जवानी की दहलीज़ पर क़दम रखा ही था कि देश के आसमां में सेटेलाइट चैनलों ने अटैक शुरू कर दिया. इन्हीं दिनों अमेरिका इराक़ पर अटैक कर रहा था और अपने इलाक़े में दो-तीन चैनल अटैक कर रहे थे. दक्षिणपंथी इसे सांस्कृतिक आक्रमण की संज्ञा देते हुए इनसे बचने की समझाइश दे रहे थे. देश के चारों महानगरों से हज़ार-डेढ़ हज़ार किलोमीटर दूर अपने कस्बे राजनांदगांव में सबसे पहले एटीएन आया और फिर ज़ी टीवी. दुष्टदर्शन की दुष्टता से परेशां हो चुके लोगों के लिए तो मानो मनोरंजन का पिटारा ही खुल गया. अपन हमेशा ख़बरें रेडियो पर सुनने और उनको प्लास्टिक की तरह चबा-चबाकर बहस करने का चर्वणसुख अपने मित्रों के साथ लेते थे. यही प्लास्टिक अपना ड्रग्स होता था.

मीडिया शहंशाह रूपर्ट मर्डोक के स्टार नेटवर्क के कंधे पर बैठकर ज़ी आया, देशी आइटम लेकर एटीएन आया और इन्हीं के साथ बीबीसी टीवी भी आ गया. अपनी आंखें तो तब भौंचक रह गईं जब पहली बार एक ऐसा चैनल देखा जिसमें गरमागरम सीन दिखाई दिए. नाम था एमटीवी. किसी अंग्रेज़ीदां ने बताया कि ये अमेरिका और पश्चिमी मुल्क़ों में युवाओं के बीच बहुत पसंद किया जाता है. वहां के युवाओं की आवाज़ है. अपन ने सोचा चलो अच्छा है अपनी आवाज़ तो ये बाद में सुनेगा लेकिन इसकी पहले सुन-देख लेते हैं. इसे देखकर अपना ड्रेसिंग सेन्स बढ़ने लगा. सिंगल या टू पीस क्या होता है, किसिंग, स्मूच वगैरह-वगैरह. सैक्स की शब्दावली अपने को यहीं समझाई गई. बडे़-बुज़र्गों की नज़रों से छुप-छुपाकर एमटीवी देख ही लेते थे. फिर चार-पांच साल और बीत गए. स्कूल से निकलकर कॉलेज में आ गए. तब तक पंद्रह-बीस चैनल धमक चुके थे. दक्षिणपंथी सरकार में आ गए और जिन चैनलों को वो सांस्कृतिक आक्रमण कहते थे उसे उन्होंने सांस्कृतिक आदान-प्रदान कहना शुरू कर दिया. चैनल चलते रहे. अपने बड़े-बूढ़ों की सख्त हिदायत होती थी कि ख़बरदार अगर टीबी-सिक्स, फ़ैशन टीवी या एमटीवी देखा. बुज़ुर्ग कहते थे- बेटा न्यूज़ चैनल देखा करो. कुछ सीखों, समझों, ज्ञान बढ़ाओं- वही काम आएगा कैरियर में.

अब ज़माना बदल चुका है. अब एक- दो नहीं तीन दर्ज़न न्यूज़ चैनल हमारे टीवी पर दिखाई देते हैं. मेरी तरह ही अब बड़े-बूढ़े इन चैनलों को देखने की बातें नहीं करते. कर भी नहीं सकते क्योंकि कौन लफ़ड़ा पाले? उन दिनों कोई हॉट सीन(कुनकुना कहूं तो अच्छा होगा) अगर टीवी के परदे पर आ गया सब मुंह फेर लेते थे या थोड़ी देर के लिए किसी दूसरे कमरे में झाकर अपनी झिझक मिटा लिया करते थे. अब हमे एमटीवी या किसी हिन्दी फ़िल्म में आ रहे उन कुनकुने सीनों के साथ तक़लीफ़ नहीं. अब तो न्यूज़ चैनलों के साथ मुश्किल हो जाती है. पता नहीं कौन-सा चैनल कब हॉट एमएमएस दिखा दे. मल्लिका शेरावत को इतनी चिंता नहीं हुई जब उनके छद्म नाम का एमएमएस पोर्न वीडियो के मार्केट में आया. लेकिन चैनलवालों ने अपनी पूरी ताक़त झोंककर पता लगा ही लिया कि वो मल्लिका नहीं बल्कि लैटिन पोर्न स्टार लॉली है. तब तक ज़मानेभर को डीपीएस कॉड के ज़रिए बताया जा चुका था कि हॉट एमएमएस क्या होता है. बड़ी चतुराई से इन्हें ऐसे मोज़ेक करके दिखाया गया कि ना छुपे और ना ही दिखे. दूसरे चैनल ने सुबह-सुबह शेन वार्न की काम-क्रीड़ा की सचित्र ख़बरें चला दीं. करीना-शाहिद के चुंबन के सीन टीवी पर ऐसे चल रहे थे मानो किसी राष्ट्रीय समस्या का ज़िक्र हो रहा हो. हाल ही में राखी सावंत ने ठुमके लगाए और वे इन चैनलों की नज़रे जम गईं. तीन-चार चैनल तो राखी-मीका के बीच छिड़े किसिंग विवाद को सुलझाने के लिए पंचायत बिठाने लगे- मानो ये मामला ना सुलझा तो देश संकट में धंस जाएगा. सुबह से लेकर देर रात तक सबके-सब इसी दिमाग़ी कसरत में जुटे थे कि इस गंभीर समस्या का हल कैसे निकले. सोचता हूं कि जब शेन और उनकी प्रेमिकाओं, करीना-शाहिद को आपत्ति नहीं तो इन लोगों के पेट में क्यूं दर्द होता है. अपने छोटे से शहर में एक इलाक़ा हुआ करता है जहां अक्सर पी-खाकर लोग आपस में भिड़ जाते हैं. दिमाग़दार लोगों की समझाइश होती थी कि उनकी लड़ाई में मत पड़ो. जब उतर जाएगी तो यही लड़ने वाले सुबह साथ प्रेमालाप करते दिखाई देंगे. हैरानगी होती है कि न्यूज़ चैनलवाले इन इलाक़ों में अब अपनी नाक घुसा बैठे हैं.

सोचता हूं कि पिताजी क्या सही कहते थे? चलिए आप न्यूज़ चैनल बंद कीजिए.. वरना आपके बड़े-बुज़ुर्ग कहेंगे - ''ख़बरदार न्यूज़ चैनल देखा तो खैर नहीं.''

8 Comments:

Blogger Jagdish Bhatia said...

मीका और राखी जैसे तो मीडीया का फायदा उठा रहे हैं। उनको कोई कलाकार तो नहीं कह सकता। न्यूज चैनल जरूर अपने को सस्ते में बेच रहे है इस प्रकार के समाचार दिखा कर।

हमारा मीडिया मैच्योर नही हुआ, व्यस्क हो गया या कहना चाहिए "केवल व्यस्कों के लिए" हो गया।

7:58 PM  
Blogger Jagdish Bhatia said...

आपका चिट्ठा नारद(http://akshargram.com/narad/)पर नहीं जुड़ा है। आप नारद पर जा कर इसे जुड़वा ले। नारद से ही सब को नए पोस्ट एक ही जगह दिख जाते है।

8:13 PM  
Anonymous Anonymous said...

“ख़बरदार न्यूज़ चैनल देखा तो खैर नहीं”
नीरज जी,
किसी ने सही कहा था एक समय आएगा कि मीडिया या तो घरों में घुस-घुस कर निजी जीवन में हस्तक्षेप शुरु कर देगा या तो कुछ लोगों द्वारा उसका इस्तेमाल किया जाएगा, आपके लेख को पढ़ने के बाद लगता है कि वे समय आ ही गया है.......हाल फ़िलहाल राखी सावंत और मिक्का का चुम्बन विवाद हो या इसी से मिलता जुलता करीना और शाहिद कपूर का विवाद हो, रिया सेन और अस्मित पटेल, मलिका सहरावत, ज्योतिका सदाना, डीपीएस केस का एमएमएस हो, अनारा गुप्ता की सीडी प्रकरण हों, इंडिया फैशन वीक में रैम्प पर सरके मॉडल के कपड़े हों, इसी से मिलता जुलता निगार खान के रैम्प पर गिरे कपड़े हों, या फिल्म इंडस्ट्री में कास्टिंग कॉउच हो, ऐसे न जाने कितने ही मुद्दे हैं जिनको मीडिया में कवरेज़ की शायद उतनी आवश्यकता नहीं थी जितनी कर्जों के बोझ से दबे किसानों कि आत्महत्या का मामला हो, देशभर में भुखमरी से मरते आदिवासी हों, खाद्यान का असंतुलित बंटवारा हो, दिल्ली में बड़ते रेप केस हों. बर्जुगों की हत्याओं का मामला हो, पंचायतों का निजी जिन्दगी में हस्तक्षेप हो, राष्ट्रीय गीत पर जारी किया गया फ़तवा को, गांवों में दलितों और महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार हों, स्वास्थ्य सेवाओं की गिरती स्थिती हो, देश में बढ़ती महंगाई हो, इन तमाम मुद्दों को मीडिया में जो उचित स्थान मिलना चाहिए था उसके लिए यह मुद्दे आज भी संधर्षशील हैं, मुझ जैसे युवा पत्रकार जो आज भी सिंद्धातों की पत्रकारिता को तव्वज़ों देते हैं यह देख कर बड़ा ही दुख होता है कि पत्रकारिता अर्श से फ़र्श की और रुख कर चुकी है ऐसा महसूस होने लगा है की मीडिया के लिए या तो समाज में मुद्दे ही ख़त्म हो चुके हैं या मीडिया समाजिक सरोकार के मुद्दो को तरज़ीह देना ही नहीं चाहती, आज राखी सावंत भूखमरी और कर्ज़ से दबे किसानों की आत्महत्याओं पर भारी पड़ चूकी है, ब्रिटेन के पत्रकार इयान हारगीव्स ने अपनी किताब जर्नलिज्म में पत्रकारों के पेशे पर टिप्पणी करते हुए बिल्कुल सही कहा है “कि राजनीति की तरह पत्रकारिता भी कम सम्मानित व्यवसायों की श्रेणी में आ गया है और इसके लिए खुद पत्रकार जिम्मेदार हैं”, अगर कड़े शब्दों में कहें तो पत्रकारिता मानसिक वेश्यावृति का शिकार हो चूकी है और आज का पत्रकार दलाली में लिप्त हो गया है, ऐसा नहीं है कि सभी न्यूज़ चैनल और समाचार पत्र मानसिक दिवालिएपन का शिकार हो चुके हैं पर जिस तरह से मीडिया में आज ख़बरों के नाम पर अश्लिलता को बढ़ावा दिया जाने लगा है उससे तो आप की यह बात सत्य ही प्रतित होती है कि एक दिन बड़े-बुज़ुर्ग कहने लगेंगे – “ख़बरदार न्यूज़ चैनल देखा तो खैर नहीं”
संदीप.

12:39 AM  
Anonymous संजय बेंगाणी said...

लिख तो अच्छा लेते हो ;)
अब तक लिखते क्यों नहीं थे?
नारदजी भारत-भ्रमण के लिए गये हुए हैं, अतः आपके चिट्ठे को अभी प्रतिक्षा करनी पड़ेगी.
क्या बतायें बुरा हाल हैं, बच्चों से भी नहीं कह सकते की कार्टून के अलावा कभी-कभार समाचार भी सुन लिया करो, क्या पता कब कौन सा राष्ट्रीय महत्त्व का सीन चला दे और हम झेंपते हुए चैनल बदल दे.

4:20 AM  
Blogger Jagdish Bhatia said...

नारद जी का काम आजकल पंकज नरूला जी (मिर्ची सेठ) देख रहे हैं।

7:06 AM  
Anonymous Anonymous said...

Sab apni dukaan chala rahay hai. Ismey hamari choice hai,dekhey ya nahi. Kehte hai ki poorey samaaj ko sudharna thoda mushkil hota hsi. Isliye apne ass paas mahoul sudhar le. Waisey itney tez bhaagtey waqt mei shayad hi kisi ko itni fursat milti hai ki Tv hi dekh le.

7:28 AM  
Blogger Manish said...

दिल की बात कही नीरज जी आपने !

9:19 AM  
Blogger Sagar Chand Nahar said...

"एम टी वी " किस जमाने की बा्त कर रहे हो नीरज भाई, कभी Ren TV देखा या नहीं, आज से दो साल पहले जब में सुरत में था उन दिनों यह चैनल काफ़ी धूम मचाया करता था, कों कि हर शुक्रवार और शनिवार की रात को 9.00बजे से ........नीली फ़िल्में प्रसारित होती थी, यह शायद रूस का चैनल है यह.

11:03 PM  

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