Monday, June 19, 2006

ताकि दुकानदारी चलती रहे..


अमरनाथ गुफ़ा के तीर्थयात्रियों के साथ धोखे की ख़बरें इन दिनों सुर्ख़ियों में हैं. मेरे परिचित जो हाल ही में अमरनाथ गुफ़ा के दर्शन कर आए हैं, ने यह भेजा है. तस्वीरों में साफ़ तौर पर तो नहीं दिख रहा कि शिवलिंग को किन्हीं व्यक्तियों ने बनाया है. किंतु बातचीत में उनका दावा था कि उसी दौरान वे वहां पहुंचे थे जब तिरपाल डालकर लिंग पर बर्फ चढ़ायी जा रही थी. हां ये तस्वीरों में ज़रूर दिख रहा है कि कैसे यहां दो व्यक्ति जूते पहने हुए विचरण कर रहे हैं. मेरे परिचित का कहना है कि उन्होंने जब वहां मौजूद कर्मियों से पूछा कि तिरपाल डालकर क्या किया जा रहा था तो जवाब मिला कि तुम्हें इससे क्या मतलब. इन परिचित ने एक अन्य एमएमएस बनाने की कोशिश की थी किंतु वहां मौजूद कर्मचारियों ने उनका मोबाइल छीनकर तस्वीरें मिटा दीं. अभी कुछ जानकारी और भी हैं. जब मिलेंगी तो भेजूंगा.
भूविज्ञानियों का कहना है कि जिस सुरंग से पानी रिसकर बर्फ बनता था वो अब बंद हो चुकी है. ज़ाहिर है ऐसे में दुकानदारी को कैसे बंद किया जा सकता था. लिहाज़ा हाथ से ही लिंग बनाकर काम चलाया गया. तथ्य है कि दर्शन के लिए पांच लाख यात्री आते हैं. अब यदि लिंग ही दिखाई नहीं देगा तो राह में पसरी दुकानदारी का क्या होगा. आस्था और व्यापार का अनोखा घालमेल साफ़ दिख रहा है. अब कौन समझाए कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते बड़े-बड़े ग्लेशियर पिघल रहे हैं तो ये कैसे बच सकता है.
पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहाड़..

5 Comments:

Blogger Srijan Shilpi said...

इस बार जिस शिवलिंग का दर्शन श्रद्धालुगण अमरनाथ की गुफा में कर रहे हैं वह प्राकृतिक रूप से बनने वाला शिवलिंग नहीं है। उसे देखकर सहज ही समझा जा सकता है कि इसे वर्फ को हाथों से थोप-थोप कर बनाया गया है। यह वीडियो क्लिप और ख़बर इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए एक बड़ा मसाला है। लेकिन तीर्थस्थलों की दुकानदारी पर इससे शायद ही कोई फर्क पड़े। हमारे देश में श्रद्धालुओं की श्रद्धा भेड़ियाधसान का रूप ले चुकी है।

8:48 AM  
Blogger Jagdish Bhatia said...

आस्था की दुकान पर अगर माल ही नहीं होगा तो गाहक कहाँ से आएगा। तो हो सकता है भोले बाबा के पुजारियों ने कुछ मार्कटिंग का तरीका निकाल हो।

9:11 AM  
Blogger Manish said...

अच्छी जानकारी दी आपने नीरज जी !

11:44 AM  
Blogger Pankaj Bengani said...

इस बार का शिवलिंग देखने से ही लगता था कि प्राकृतिक नही है. दरअसल जनता ही मुर्ख है, धर्म के ठेकेदार लोगों को लुटते हैं, और हम खुद को.

8:59 PM  
Anonymous संजय बेंगाणी said...

श्रद्धा और व्यपार नहीं, बल्कि श्रद्धा का व्यपार कहिए. आज के हालत ऐसे हैं कि श्रद्धा के नाम पर लुटने वालो कि नहीं पर चेताने वालों की सामत आ जाती हैं.

10:50 PM  

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