वे दो 'पच्चीस जून'
२५ जून का यह दिन ऐतिहासिक है. कई मायनों में. हर दिन की तरह इसका भी सूरज उगता है किसी और दिन की ही तरह.. लेकिन शाम ढलते-ढलते यह दिन एक नया धर्म दे गया. पुराने धर्म को अलविदा कह गया ये दिन.. लोगों को नए सितारे दे गया. साथ ही आधी रात बीतते तक देश के राजनीतिक इतिहास पर कलंक छोड़ जाता है यह दिन. देश के लोकतांत्रिक इतिहास का काला अध्याय बन जाता है और सोचने पर मजबूर करता है यह दिन.. कि कैसे पाशविक बहुमत से चुनी सरकार भी लोकतंत्र के लिए घातक हो सकती है. दो दिनों के बीच की इसी काली रात पर देश की दो उच्च संस्थाओं ने लोकतंत्र का गला घोंटने का अक्षम्य अपराध किया था. तो इसी दिन ने गांवों-शहरों को नए खेल से परिचित कराया था जो बाद में बहुतों की रगों में उतरता चला गया.
लोकतंत्र पर ग्रहण
बात २५ जून की कर रहा हूं. १९७५ में २५ और २६ जून की दरम्यानी रात को इंदिरा गांधी की सरकार राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद से आपातकाल के दस्तावेजों पर दस्तख़त करा रही थी. इंदिराजी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश से बिफ़र कर समूचे लोकतंत्र को अपने कब्ज़े में ले लिया था और अगली सुबह देश का आम आदमी जब उठा तो उसके मुंह पर ताला लगाया जा चुका था. जेल इंदिराविरोधी नेताओं से ठूंसे जा रहे थे. संजय और उनकी चौकड़ी को मानो स्वेच्छाचारिता का लाइसेंस मिल गया. गांवों-शहरों में पुलिसिया अत्याचार कहर बरपा रहा था. कलाकार हो या साहित्यकार या फिर पत्रकार.. सबके सब मारे भय के ख़ामोश थे या फिर ज़ुबां खोलने की सज़ा भुगत रहे थे. मैं बहुत छोटा था.. पिता जी पुलिस में थे और व्यवस्था के अहम हिस्से थे. उनकी नज़रों में ये अनुशासन पर्व था. मेरी नज़रें और नज़रिया इस लायक नहीं थे कि कुछ समझ सकूं और कह सकूं. किंतु आगे मैं अपने पिता को यह मनवाने में कामयाब हुआ कि इंदिरा जी ने जो किया वो कई मायनों में ग़लत था.
'धर्म' का उदय
आठ साल बाद यह दिन फिर आया लेकिन इस दफ़ा अपने साथ यह क्रिकेट नाम का धर्म लेकर आया था. ब्रिटिश सामंतवादी शासन का प्रतीक बने इस खेल के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ने वाले तब ख़ामोश हो गए जब कपिल देव के दल ने अंग्रेज़ों की धरती पर इसी दिन विश्वकप उड़ाया. यह भारतीय क्रिकेट जगत का स्वर्णिम दिन था. मैं छोटा था लेकिन क्रिकेट का दीवाना. उस दुपहरी को हमारे खिलाड़ी लॉर्डस के मैदान पर उतरे और श्रीकांत के ३८ रनों के साथ साठ ओवरों में १८३ रन बनाएँ. लगातार तीसरी बार विश्वकप जीतने के ख़्वाब के साथ उतरी वेस्टइंडीज़ को भारी आंका जा रहा था. कप्तान कपिल देव और मध्यगति के गेंदबाज़ मोहिंदर अमरनाथ की गेंदबाज़ी के आगे वेस्टइंडीज़ के ख़िलाड़ी एक-एककर पेवेलियन चलते गए. वहां विकेट गिरते और इधर मुहल्ले की इकलौती टीवी के सामने दरी पर बैठी हम बच्चों की टोली बल्लियों उछल जाती. आख़री विकेट माइकल होल्डिंग का गिरा. मोहिंदर ने उन्हें पगबाधा आउट किया और दौड़ पड़े स्टम्प उखाड़ने. मैं उस झण को भूल नहीं पाया. भला कौन भूलना चाहेगा. सारे खिलाड़ी पेवेलियन भागे और उनके पीछे भागे इंग्लैंड में बसे भारतीय. कप्तान कपिल के हाथों चमचमाता विश्वकप और साथ में गावस्कर, मदनलाल जैसे बेहतरीन खिलाड़ी. अब तक वो कहानी दोहरायी नहीं जा सकी. वो निसंदेह महान खिलाड़ी थे. बिना चूके एक ही झटके में उड़ा ले गए थे वो प्रूडेंशियल वर्ल्ड कप और सारी दुनिया देखती रह गई. ठीक एक साल पहले दिल्ली के एशियाड फ़ाइनल में हॉकी की पराजय से निराश हो चुके लोगों के लिए यह बरसों के अकाल के बाद आई बारिश की पहली फुहार के मानिंद था. सब हर्षित थे और फैल रहा था क्रिकेट नाम का नया धर्म. संयोग देखिए इसी तारीख को १९३२ में भारत ने इसी मैदान पर सबसे पहला अंतरराष्ट्रीय टेस्ट मैच खेला था.


5 Comments:
गज़ब की याददाश्त है नीरज भाई,
कुछ दिनों पहले राजस्थान में मेरे पापाजी के पुस्तकों के संग्रह में लोकनायक जय़ प्रकाश नारायण की आत्म कथा पढ़ी, आपात काल के समय इन्दिरा विरोधियों पर किये अत्याचार पढ़ कर हैरत हुई,कई बड़े नेताओं को जेल में सिगरेट से दागा गया था(पुस्तक में चित्र भी है)।
बहुत बढ़िया लेखन. धन्यवाद!
सच कहा १९७५-१९७७ मुश्किल समय था जिन्होने emergency का दौरान देखा नहीं उनके लिये उस समय के बारे मे सोच पाना मुश्किल है
बहुत खूभ, आपकी याददाश्त को मेरा सलाम :)
लेकिन एमरजेंसी जैसा ही कोई उपाय भारत की नैया पार लगा सकता है। हमें एक डिक्टेटर चाहिए, शायद हिटलर या फिर कम से कम इंदिरा गांधी जैसा ही।
Post a Comment
<< Home