Monday, July 31, 2006

परमाणु समझौता- उत्तरदायित्व किसका?

मैंने बहुत ज़्यादा तो नहीं लेकिन मोटे तौर पर भारत-अमेरिकी सिविल न्यूक्लियर डील के बारे में पढ़ा है. १९७४ से हम पर अमेरिकी प्रतिबंध है. यानी परमाणु शक्ति के मामले में हम अमेरिका पर निर्भर नही रहे. विगत कई दशकों से हमारे वैज्ञानिकों ने इस दिशा में बिना अमेरिकी मदद के बहुत कुछ हासिल किया जो देश के चुनिंदा मुल्को को हासिल है. इस मामले में हमारा रवैया ज़िम्मेदारी भरा रहा है. १८ जुलाई २००५ को बुश ने हमें भरोसा दिलाया कि प्रस्तावित समझौते को अमेरिकी संसद के दोनों सदनों की मंजूरी दिलाने की दिशा में वे भरसक प्रयत्न करेंगे. इस समझौते के अमल मे आने के बाद भारत को परमाणु संवर्धन सामग्री अमेरिका की ओर से मुहैया कराई जाएगी. एक साल पहले यह बातचीत अमेरिका गए हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और जॉर्ज बुश के बीच हुई थी.

बुश इन दिनों इस समझौते पर मुहर लगवाने के लिए सदन के दोनों सदनों (सीनेट और हाउस ऑफ़ रिप्रेज़ेंटेटिव) में एड़ी चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं. भारत विरोधी लॉबी इसमें कुछ शर्तें जोड़ने की कोशिशें कर रही हैं तो कुछ ऐसे भी प्रतिनिधि हैं जो इस समझौते को परमाणु अप्रसार की दिशा में रोड़ा समझते हैं. यानी सुपरपॉवर अमेरिका का सर्वशक्तिशाली राष्ट्रपति इन दिनों समझौते पर मुहर लगवाने के लिए ज़ोर लगा रहा है और मेरे देश का प्रधानमंत्री इस डील के बारे में मौन है. उसका उत्तरदायित्व क्या है ये किसी को नहीं मालूम...सरदार जी मीडिया के सामने कहते हैं कि उन्हें विपक्ष की चिंताओं का पता है और वे इस पर विचार कर रहे हैं. ये कैसा प्रधानमंत्री है जो इतने बड़े समझौते के बारे में खुलासा करना अपना कर्तव्य नहीं समझता. क्या जनता को यह जानने का अधिकार नहीं कि उस समझौते में ऐसा क्या है जो भारत के हित में है या नहीं है? या तो सरकार में बैठे लोग ये मानते हैं कि हमारी संसद इस विषय की बारीक़ियों को समझने का माद्दा नहीं रखती या फिर उन्हें कुर्सी मिलते ही ये गुमां हो गया है कि वे चाहे जो समझौते कर लें- इस देश में कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है.

क्या यह सही नहीं है कि इस समझौते के मुताबिक़ अमेरिकी संसद को यह अधिकार होगा कि वह सालाना इसकी समीझा करे और भारत का रुख देखते हुए वह इसके आगे जारी रखे या नहीं रखे- के लिए स्वतंत्र है. यानी बदले में भारत को लगातार अमेरिका के हर अच्छे-बुरे का समर्थन करना ही होगा. यानी हमारी विदेश नीति भी ब्रिटेन की चाटुनीति का ही अनुसरण करेगी? ऐसी चंडाल चौकड़ी (P-5) में जाने से तो बेहतर है कि हम अपने दम पर तटस्थ रहे. रख ले वापस तू अपना सपोर्ट अमेरिका! तू इधर दिल्ली में चाय पीता है तो इस्लामाबाद जाकर शरबत.

जब किसी समझौते को कसौटी पर कसने के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति को संसद का विश्वास हासिल करना ज़रूरी है तो मेरे देश के प्रधानमंत्री को यह स्वतंत्रता क्या संसद ने दी है? आपको शायद यह जानकर हैरानी होगी कि विपक्षी दलों के एक सांसद से निजी तौर पर हुई बातचीत में उनका इस विषय पर मुझसे कहना था कि हमें तो समझौते के बारे में जानकारी मीडिया के ज़रिए मिलती है. कुछ ऐसा ही मेरे मीडियाकर्मी मित्र का कहना था कि वामदलों में भी इसी बात को लेकर नाराज़गी है. क्या भाजपा, सपा और वामदलों का साझा विरोध महज़ राजनीतिक बवाल है? क्या ये हमारी सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है कि संसद के ज़रिए जनता को हमेशा बताया जाए कि किन देशों के साथ किस तरह का समझौता किया जा रहा है और इन समझौतों पर उठी आशंकाओं का निवारण करें. इतना ही क्यों.. पहले भी दोहा राउंड की डब्ल्यूटीओ वार्ताओं पर देश की सरकार इसी तरह का मौन साधे हुए थी.

न्यूक्लियर समझौते का खुलासा आज इसलिए भी ज़रूरी है कि हमारा भरोसा इन नेताओं पर से उठता जा रहा है. ऊपर से जब पीएमओ में जासूसों की बात सुनते हैं तो यह आशंका और बढ़ जाती है. कुछ दिनो पहले केजीबी के पूर्व लाइब्रेरियन मित्रोखिन की आत्मकथा में हुए खुलासे के बाद अब इन दिनों अमेरिकी जासूस की चर्चा ज़ोरों पर है.

Monday, July 24, 2006

प्रिंस को बचाना है..

Image Hosted by ImageShack.us५० घंटों तक मौत से जूझने के बाद आख़िरकार प्रिंस बाहर आ गया. प्रिंस हरियाणा के कुरूक्षेत्र ज़िले के हल्देरी गांव के रामचंद्र नाम के दिहाड़ी मज़दूर का बच्चा है. शुक्रवार को पांच साल का यह बच्चा अपने साथियों के साथ पकड़म-पकड़ी खेलते हुए एक फ़ुट चौड़े और ५३ फ़ुट गहरे गढ्ढे में गिर गया था. ग्रामीणों और ज़िला प्रशासन ने शनिवार दोपहर तक उसे बाहर निकालने की भरसक कोशिश की लेकिन नाकामयाब रहे. पंद्रह किलोमीटर दूर अम्बाला छावनी में मौजूद सेना से मदद मांगी गई. सैनिकों ने दोपहर तीन बजे से इस ऑपरेशन की कमान संभाली और रविवार रात आठ बजे तक प्रिंस अपनी मां के आंचल में पहुंच चुका था.

इस घटना ने मुझे द्रवित कर दिया है. पिछले २४ घंटों में कुछ और ख़्याल नहीं था कि दुनिया में कहां-क्या हो रहा है. चिंता तो थी बस यही थी कि प्रिंस को बचाना है. ग़रीब बाप का यह बच्चा प्रिंस जीवन और मौत के बीच जूझते हुए बहुत-सी बातें कह रहा था. मैं उसकी सिसकारियों में जीवन संघर्ष के मायने ढूंढ रहा था. रात ढलते-ढलते तक सारी दुनिया में बसे भारतवासियों तक यह ख़बर मीडिया के ज़रिए पहुंच चुकी थी. कल तक उलजूलूल ख़बरों में डूबा मीडिया आज अपनी सार्थक भूमिका निभाते-निभाते खुद को हैरान पा रहा था. देश के दर्ज़नभर ख़बरिया चैनलों में दुनियाभर से लाखों फ़ोन कॉल्स और इतने ही मैसेज आ रहे थे. मैं देख रहा था और महसूस कर रहा था कि कैसे एक छोटे से बच्चे ने दुनियाभर के भारतवासियों को एक सूत्र में पिरो दिया. मीडिया लाखों-करोड़ों जनों की भावनाओं की ज़बान बन रहा था.

बच्चा गढ्ढे में गिरता है. उसे गढ्ढे से बाहर निकालने के लिए करोड़ो हाथ आसमां की ओर दुआ के लिए उठते हैं. मीडिया पर फ़ोन कालों का सिलसिला शुरू होता है. जयपुर का रमज़ान, लखनऊ का रमाकांत मिश्रा, गुवाहाटी का रमेश, मुंबई का सलीम, बिलासपुर का केदार शर्मा, दुबई से जगजीत वालिया, पटना से केपी झा, अंडमान से कैप्टन सुखबीर– सभी बच्चे के लिए दुआएं करते हैं. ये भारतवासी अलग-अलग नामों के हैं, अलग मज़हब, अलग जाति के हैं. इनमें से शायद ही किसी ने उस मासूम प्रिंस को देखा होगा.

मीडिया कवरेज
स्टार न्यूज़- ऑकलैंड न्यूज़ीलैंड से अनवर और उनकी अहलिया रुंधे गले से रात तीन बजे बताते हैं कि उनने प्रिंस की सलामती के लिए दो रकात नमाज़ पढ़ी है. इस चैनल का एंकर सईद अंसारी रात ग्यारह बजे से दूसरे दिन दस बजे तक बिना रुके कार्यक्रम प्रस्तुत करता है.
ज़ी न्यूज़- इस चैनल ने शनिवार दोपहर पौने दो बजे ख़बर ब्रेक की थी. स्लग दिया- प्रिंस को बचाना है. इस चैनल को नोएडा से मैकेनिकल इंजीनियर निखिल सुझाव देते हैं कि कैसे रसायन-विशेष का इस्तेमाल करते हुए मिट्टी का खिसकना रोका जा सकता है. इसी सीधे प्रसारण के बीच-बीच में यह चैनल कन्या भ्रूण हत्या के ख़िलाफ़ जनजागरण का विज्ञापन चलाता है.
इंडिया टीवी- लखनऊ के नेत्रहीन बच्चों को प्रिंस की सलामती के लिए प्रार्थना करते दिखाता है. घटनास्थल पर पहुंचा रिपोर्टर आशीष सिंह बताता है कि प्रिंस की जीत को वहां मौजूद हर बंदा अपनी निजी जीत मान रहा है. हर किसी के चेहरे पर मुस्कान खिली है.
एनडीटीवी- अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में अरदास, मुंबई के मदर मेरी चर्च में प्रेयर और यहीं की मस्जिद में विशेष नमाज़ अता करते हुए दिखाता है. सीधा प्रसारण सिद्धिविनायक मंदिर से भी होता है जहां बच्चे के लिए गणदेव से पूजा की जा रही है.

र कोई जुटा था प्रिंस को बचाने की जद्दोजहद में. जो सेना रणमोर्चे पर लड़ते हुए शत्रुओं को पलभर में मौत की नींद सुला देती है या अपनी जान न्यौछावर कर देती है, वह सेना आज एक नन्हे बालक को ज़िंदगी दे रही थी. अंततः भारतीय सेना और उसके साथ सहयोग कर रहे सैकड़ों ग्रामीण प्रिंस को बचाने में कामयाब होते हैं.

मुंबई धमाकों के बाद किन्हीं लोगों के मानस पटल पर एक दरार-सी पड़ी थी. उन्हें लगा था कि अब बस.. बहुत हो गया... ये क़ौम हमें चैन से जीने नहीं देगी. हम बदला लेंगे. कुछ ने कोशिश की कि उन धमाकों के थमे गुबार से खून की ज्वाला भी उठे. लेकिन हम ख़ामोश रहे. तमाम तर्कवादियों ने भरसक कोशिशें की थीं कि प्रतिक्रियावाद का ज्वार उठे लेकिन हम ख़ामोश रहे. इज़रायल का हवाला दिया गया कि एक वो मुल्क़ है और एक हम मुल्क़ हैं लेकिन हम ख़ामोश रहे. दरअसल, ऐसी प्रतिक्रियाएँ किसी राष्ट्रवादी का दूसरे राष्ट्र के प्रति झलक रहा ग़ुस्सा कम बल्क़ि इसकी आड़ में धर्म-विशेष के मतावलंबियों को निशाना बनाए जाने की घिनौनी साज़िशें ज़्यादा रहीं. इन कोशिशों पर धूर्तता से देशभक्ति का मुलम्मा चढ़ाया जाता है. जिहादी जंग से लेकर हंटिग्टन थ्योरी और राजनीतिक सत्यता तक के तर्क गढ़े जाते हैं. क़ौम के ख़तरे में होने का नारा लगाकर जिहाद के नाम पर आत्मघाती क़दम के लिए हज़ारों युवाओं को भड़काने पर उतारू किया जाता है. कोशिश पूरी होती है कि किसी तरह तनाव फैले, दंगे हों, उन्माद हो.

फिर भी तमाम तर्कों को धता बताते हुए मुंबई ख़ामोश रहा और चल पड़ा अपनी उस पुरानी राह पर जहां उसे लंबा सफ़र तय करना है शक्तिशाली और समृद्ध भारत का. इधर, प्रिंस की घटना ने भी मीडिया के ज़रिए बहुतेरे लोगों ने यह जता दिया कि कोई ताक़त उनकी एकता को तोड़ नहीं सकती.

बच्चा गहरे गढ्ढे में गिरा था. बाहर आ गया. लेकिन मुझे चिंता उनकी होती है जो
विचारों के रसातल में गिर चुके हैं. ऐसे गहरे गढ्ढों में गिर गए हैं जो सांप्रदायिक, जातिवादी, रंग और नस्लभेदियों ने खोदकर रखे हैं. शायद उन्हें इस घटना ने सबक सिखाया होगा.

यह दिखाया होगा कि संवेदनाओं की सीमा नहीं होती.. मज़हबीं, जातीय, नस्ली सीमाएं मायने नहीं रखतीं. उन्हीं संवेदनाओं को विस्तार देते हुए मैं इज़रायल-लेबनान युद्ध में मारे जा रहे और जान बचाने की जद्दोजहद मे जुटे लाखों लोगों के प्रति अपनी हार्दिक संवेदना व्यक्त करता हूं. यह घटना हमें प्रेरणा दे रही है कि संवेदनाओँ को विस्तार दें.. क्योंकि बहुत-से प्रिंस है जो अब भी ज़िंदगी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. देश की सड़कों पर बने फुटपाथों पर.. चाय की ठेलियों पर.. टोकरियां थामे कचरे के ढेरों पर. ज़रूरी है इन प्रिंसों को बचाना.

Tuesday, July 18, 2006

अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला

मित्रों, मुझे नहीं पता कि अपने चिट्ठे पर कीबोर्ड का यह सिपाही कितने दिनों तक लिख सकेगा. ख़बरे आईं हैं कि देश के कई हिस्सों में जाल सेवा प्रदाताओं ने चिट्ठाकारी की कई साइट पर पाबंदी लगा दी है. आतंकवादियों को पकड़ने में नाकाम रहा हमारा तंत्र अब इस तरह का तुगलकी फ़रमान जारी कर चुका है. यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आघात है. इसका विरोध किया जाना चाहिए. आईये, इस बेतुकी सेंसरशिप के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करें.
अब दस्तकों का दरवाज़ों पर होता नहीं असर

हर हथेली ख़ून से तरबतर होनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए (दुष्यंत कुमार)

मीडिया युग नामक चिट्ठे के लेखक और मेरे मित्र भव्य श्रीवास्तव भी इसी तुगलकी आदेश का शिकार हुए हैं. लिहाज़ा इनका पोष्ट मैंने अपने चिट्ठे पर प्रकाशित किया है.

Hello Friends,

An undeniable fact that the "Right to expression" was curbed by the government in the name of security tantrums. Blogs are bard by the ISP in the order of government. MEDIA YUG condemn this. So unite expression is must. History shows us that the suppression was not aLways one head. Government has also indicated that the broadcastiong sector must controled by him. So he is carry forward to take the bill to the parliamnent.

Blogs becomes the lifeline of netizens, and the role it plays in crisis time is undefeatable.Tsunami, Quake, Attack, Disaster, and Blast, in all incidents the bloggers are always available with powerpacked information and help.

So why the governmant is acting like a draconian state. Same happening in china, resist the bloggers.

So kindly raise a voice against this atrocity.

We need your proper support. Also guidelines from you that, how we move forward to make a resistence against all this.

MEDIAYUG
A dedication


चाहता हूं निज़ामे कुहन बदल डालूं
ये बात फ़कत मेरे बस की नहीं.
हम सब की बात है
दो चार दस की बात नहीं.

अपनी आवाज़ बुलंद कीजिए और यहां चर्चा कीजिए

Thursday, July 13, 2006

मुंबई 7/11 - तस्वीरों में

Wednesday, July 12, 2006

तेरा दर्द मेरे दर्द से ज़्यादा कैसे?

बुधवार सुबह के अख़बारों की सुर्ख़ियों में एक शब्द बार-बार दिखाई पड़ा- 7/11. ये शब्द मानो अमेरिका के 9/11 की याद दिला रहा है. पहले पहल चैनलवालों ने इस शब्द का इस्तेमाल किया. इससे तुकबंदी मालूम होती है. लेकिन पीछे का मर्म यह है कि हम दुनिया को बता रहे हैं कि अमेरिकी और उनके चाटूकार मित्र देख लें कि भारत भी आतंकवाद की आग में झुलस रहा है. मुझे याद पड़ता है ट्विन टॉवर पर अटैक के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक लाइन का बयान जारी किया था- Either you are with us, or you are with the terrorists.

सभ्यता के प्रसार के नाम पर हमले कर रहा एक शक्तिशाली देश एकध्रुवीय दुनिया के छोटे-मोटे देशों को मानो ललकार रहा हो कि या तो हमारे साथ आओ वरना आतंकवादियों में गिने जाओगे. भारतीय वक़्त के मुताबिक़ शाम का वो हादसा था और थोड़ी ही देर में जॉर्ज बुश दुनिया को एक मायने से ललकार ही चुके थे कि उसके फ़ौरन बाद हमारी सरकार को जाने कौन-सी आस बंध गई कि वाजपेयी साहब ने कह दिया- भारत आतंकवाद के ख़िलाफ़ है, हम अमेरिका को सपोर्ट देते है. तब किसी दोस्त के घर बैठा हादसे की लाइव तस्वीरें देखते हुए मैं सोच रहा था शायद वाजपेयी साहब को आस थी कि इसी बहाने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कुछ कर गुज़रने का मौक़ा मिलेगा. रात ढलते तक मुशर्ऱफ़ भी टीवी पर आए और दो बातें कह गए. पहली पाकिस्तान इस्लाम का क़िला है, देशवासी बुद्धिमानी से काम लें और दूसरी यह कि अमेरिका में हुए हादसे में हम पाकिस्तानी उनके साथ हैं. तीनों राष्ट्रप्रमुखों ने अपने राष्ट्र की ज़रूरत के मुताबिक़ बातें कह दीं थी.

हमें आस थी कि अमेरिका 1991 की तरह हमारे एयरबेस इस्तेमाल करेगा. लेकिन अमेरिका का तात्कालिक दुश्मन पाकिस्तान नहीं था. उसे तलाश थी लादेन की. कुछ अरसे पहले रूसी चंगुल से छूटे और तालीबानी हुकुमरानों में फंसे अफ़ग़ानिस्तान पर अमेरिकी प्रभुत्व जमाने का अच्छा मौक़ा था. बुश ने भारत को नज़रअंदाज़ किया और पाकिस्तान की बांहें मरोड़कर उससे वह काम करवा लिया जो पाकी राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के लिए टेढ़ी खीर था.

हम बात कर रहे थे 9/11 और 7/11 की. मुंबई में मंगलवार को हुई वारदात की ख़बर आते ही मुस्लिम चरमपंथियों पर शक़ की सुई दौड़ गई. इस तरह की वारदात उन्हीं की कारगुज़ारी हो सकती है. देश की यूपीए सरकार के पास जादुई चिराग़ नहीं है जो इन शैतानों को तुरंत-फुरत पकड़कर फांसी पर चढ़ा दे. चिराग़ तो बुश के पास भी नहीं था लेकिन हौसला था. परमाणु बम बना लेना बहादुरी की बात नहीं होती. जैसे ज़ेब में चाकू रखने से चाकू चलाने की हिम्मत नहीं आ जाती. हम होंगे परमाणु शक्ति लेकिन हिम्मत तो अपनी चाकू चलाने की भी नहीं है. संसद पर हमले के वक़्त भी वाजपेयी साहब ने आर-पार का ऐलान किया था. लेकिन वे आर ही आर रहे, कुछ दिनों में हम फिर पाकिस्तान के पार हो गए.

इस वक़्त हमारे गृहमंत्री शिवराज पाटिल से लेकर प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह सिर्फ़ आंसू बहा रहे हैं. दुनिया जानती है, भारत का बच्चा-बच्चा जानता है कि पाकिस्तान के कट्टरपंथियों ने हमारा जीना हराम कर रखा है. लेकिन उस पाकिस्तान को फटकार लगाते हुए एक लफ़्ज़ हमने नहीं कहा है. सीबीआई और रॉ जैसी एजंसियां यहां तक कि मोसाद और अमेरिकी एजंसियां भी कई दफ़ा कह चुकी हैं कि सीमापार आतंकियों के ट्रेनिंग कैंप चल रहे हैं.

हम भी जानते हैं कि आतंकी किसी धर्म-ईमान के नहीं होते. मज़हब का तो बहाना है. मुंबई में ख़ून हिन्दू का बहा है तो मुसलमान का भी. मैंने कल देखा कि कैसे कुछ मुसलमान भी हादसे के दौरान कंधे से कंधा मिलाकर अपने इंसान होने का सुबूत दे रहे थे. लेकिन पाकिस्तान के उन चरमपंथियों को मैं मुसलमान भी नहीं मानता. इनका ग़िरेबां पकड़कर पूछा जाना चाहिए कि ये सब करके वे क्या हासिल करते हैं. क्या वे यह समझते हैं कि देश के पंद्रह करोड़ मुसलमान उनके बहकावे में आ जाएंगे? जिन हिंदुओं को भी यह बदगुमानी है कि मुसलमान पाकिस्तान का ही साथ देंगे तो वे अशफ़ाक़ उल्लाह खां से लेकर राष्ट्रपति कलाम तक लंबी-चौड़ी लिस्ट बना सकते हैं. वे यह भी देख सकते हैं कि कैसे तीन-तीन युद्धों के दौरान उन्होंने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ आवाज़ें बुलंद की हैं. कुछ सुझाव सुनने में आएं हैं कि सीमापार के वे कैंप जहां अरसे से आतंकियों को तैयार किया जा रहा है उन पर हमले करने चाहिए. तब क्या अमेरिका हमें इसकी इजाज़त देगा? शायद नहीं क्योंकि पाकिस्तान से गुरेज़ रखना बुश की नीति नहीं है. वो पुचकार के चलता है मुशर्रफ़ सरकार को. बल्क़ि होना तो यह चाहिए कि हमारी सरकार ही यह ऐलान करे कि पाक सरकार ही हमें उन ठिकानों को नष्ट करने में सहयोग करे. ऐसा करते हुए हम कूटनीतिक हमले करेंगे. अमेरिका और उसके मित्र देश जब दुनियाभर में अपने हमले को जायज़ बताने के लिए साम-दाम-दंड का सहारा ले सकते हैं तो हम क्यों नहीं? हमें बातचीत के सारे रास्ते बंद करने की धमकी देनी चाहिए. अमेरिका के सामने ही यह बात रखी जाए कि आपका दर्द, दर्द है तो हमारा क्यों नहीं? पिछले पंद्रह सालों में साठ हज़ार से ज़्यादा लोगों को हमने कश्मीर में खो दिया. देशभर में कई वारदातो में हज़ारों मारे गए. फिर भड़के दंगों में करोड़ों की धनहानि और जानें गईं. किसकी शह पर? ज़ाहिर है पाकिस्तानी कट्टरपंथियों की वजह से.

पिछली दफ़ा दिल्ली दहली थी तब भी कुछ इसी तरह का मंज़र था. कोई शिक्षा नहीं ली गई. आज मुंबई फिर तड़प उठा है. कुछ दिन का हल्ला मचेगा और फिर शुरू हो जाएगा हमारा किरकिटिया उन्माद... अगले महीने श्रीलंकाई दौरे की चर्चा में हम डूबेंगे और भूल जाएंगे कि कभी मुंबई दहली थी. तब हमारी सरकार सीबीएम टाक की प्लानिंग लेकर इस्लामाबाद जाएगी और खाली हाथ वापस आ जाएगी.

Tuesday, July 11, 2006

मुंबई 7/11: मृत और घायलों के नाम

मंगलवार ११ जुलाई २००६ को मुंबई में हुए बम धमाकों में तक़रीबन २०० लोगों के मारे जाने की ख़बर है और ६५० के लगभग लोग घायल हुए हैं. आप मृत और ज़ख़्मी लोगों के नाम यहां देख सकते हैं. मरीज़ों के नाम और उनकी दशा का विवरण भी यहां दिया गया है. कृपया मुंबई पुलिस को सहयोग देते हुए इन पतों को अपने परिचितों को दें. मुंबई पुलिस की दरख़्वास्त है कि अफ़वाहों पर ध्यान ना दें और किसी भी तरह की खबर की पुष्टि के लिए राष्ट्रीय टीवी चैनल पर नज़र रखें. इसके अतिरिक्त बम धमाकों से जुड़ी कोई वीडियो आपके पास हो तो ०९३५०५ ९३५०५ अथवा ०९३१२००७१३० पर संपर्क करें. संदिग्ध गतिविधियों से जुड़ी या आतंकियों की कोई ख़बर के लिए मुंबई पुलिस की हेल्प लाइन पर कॉल करें. 22621855
22621983
22625020
22641449
22620111

यहां देखें. http://mumbaipolice.org/images/news_cp/1blast/blast.htm

डूस्ड (DOOCED)

इस शब्द का रिश्ता कंप्यूटर और इंटरनेट की दुनिया से है, आज कल बहुत से लोग अपनी रुचि के लिए ऑनलाइन डायरी या दैनिकी लिखते हैं जिसे ब्लॉग (BLOG) कहा जाता है (यह शब्द अपने आप में वेब लॉग का संक्षेप है).

फिर भी अगर ब्लॉग लिखने वाला अपने दफ़तर या अपने अफ़सर के प्रति कोई ऐसी बात लिख दे जिस के कारण उसकी नौकरी चली जाए तो नए मुहावरे में इसे इस प्रकार कहेंगे,He is dooced.

यह शब्द अमरीका में तीन वर्ष पूर्व उस समय प्रयोग हुआ था जब हेदर आर्मस्ट्रांग नाम की एक महिला ने अपने ब्लॉग में कार्यालय में होने वाली कुछ गड़बड़ का उल्लेख किया था जिस के कारण बॉस ने उसे नौकरी से निकाल दिया.

उस महिला ने जाते हुए अपने दोस्तों के लिए यह नोट छोड़ाः
Never write about work on the internet, unless your boss knows about the fact.यानी, अपने अफ़सर के ज्ञान में लाए बिना कभी दफ़्तर की बातें ब्लॉग में नहीं लिखना.

लेकिन इस में रोचक बात यह है कि निष्कासित होने वाली महिला की वेबसाइट का नाम था डूस डॉट कॉम dooce.com और यहीं से वे सारे शब्द निकले जो आज ब्रितानी अंग्रेज़ी का हिस्सा बन चुके हैं.
Dooce
Doocing
Dooce
dodging
Blogo phobia
Blogophobic
अंतिम दो शब्दों का अर्थ है ब्लॉग का भय और ब्लॉग के भय से संबंधित कोई भी वस्तु.
वर्ष 2005 के दौरान पत्रकारिता और संचार साहित्य में फलने फूलने वाला सब से महत्वपूर्ण शब्द है. (स्रोत- बीबीसी)

Monday, July 10, 2006

Older Windows to Lose Support

Microsoft Corp has announced that starting July 11, the company will end support for some of its older Windows versions. In effect, around 70 million users will be left stranded without security updates.
The versions that will be affected, according to Microsoft, are Windows 98, Windows 98 Special Edition (SE), and Windows Millennium Edition (ME). As such, users of these versions will be left with no protection in terms of security patches and other such software fixes that Microsoft regularly issues, leaving them open to attacks by malicious hackers.
Microsoft had in January planned to discontinue updates for older versions, but extended the time period to give users maximum time to upgrade.
Meanwhile, according to industry sources, of the total number of Window users, only around 13 percent of PCs run licensed versions of Windows 98 or Windows ME.
As per an earlier study by IDC, a Massachusetts-based market research firm, an estimated 48 million computers were still running licensed versions of Windows 98 at the end of 2005, with 25 million still using Windows ME. The firm had at the time expressed the view that by the end of 2006, the number of Windows 98 and Windows ME installations would take a huge dip.

Sunday, July 09, 2006

संबंध खंगालने का गुर

फ़ुटबॉल में अपनी उम्मीदें ख़त्म हो गईं. हिन्दुस्तान की बात नहीं हो रही है. अपना तो नंबर ११७वां है. दुनिया में तक़रीबन २०४ देश फ़ुटबॉल खेलते हैं. सोचो यदि इतने ही देश क्रिकेट खेलते तो अपना नंबर क्या होता. यक़ीनन अपन १०० के बाहर होते. मैं बात कर रहा हूं फ़ुटबॉल विश्वकप में ब्राज़ील और अर्जेंटीना की. दोनों लैटिन देशों से उम्मीद लगाए करोड़ों लोगों की आशाओं पर पानी फेर दिया इन यूरोपियन्स ने. अपन की ब्राज़ील और अर्जेंटीना से हमदर्दी क्यों हैं. हां भई ये समर्थन नहीं हमदर्दी ही कहो. दर्द हमारा और उनका एक-सा है. अव्वल तो अपनी और उनकी चमड़ी एक जैसी है. उनका सांबा तो अपना भांगड़ा. दोनों में ज़बर्दस्त फाकां-मस्ती. तीसरा यह कि अपने यहां भी आम आदमी बसता है और उनके यहां भी. तीनों कर्ज़दार. सुना तो ये भी है कि अर्जेंटीना की माली हालत पिछले दिनों बड़ी ख़राब थी, मेरी तो अभी भी नहीं सुधरी. इंसान बड़ी आसानी से अपनी बिरादरी या बिरादरी-सा ढूंढ लेता है. इस दर्द को अपने एनआरआई साथी अच्छी तरह समझ सकते हैं.

एक कहानी याद आई- गुरू-चेला ठहरे अफ़ीमची. जा पहुंचे किसी शहर में.. शहर उनके लिए नया था सो अफ़ीम कहां मिले ये पता ना था. तभी गुरू ने अपनी घंटाली दिखाई और चेले को कहा- तू राह की दूसरी तरफ़ जाकर खड़ा हो जा, मैं इधर खड़ा होता हूं. गुरू ने पतंग उड़ाने की मुद्रा बनाई और आसमान की ओर देखने लगा. चेले ने काल्पनिक चकरी संभाल ली और ढील देने लगा गुरू को. आसपास के लोग आते-जाते रहे, किसी ने ध्यान न दिया. तभी एक आदमी दोनों के बीच में आया और धागे (जो था ही नहीं) को ऊपर उठाकर आगे बढ़ गया. गुरू-चेले ने उसको दबोचा और पूछ बैठे- बता अफ़ीम कहां मिलेगी? तो ऐसे बनता है काम.

बात हो रही थी ब्राज़ील-अर्जेंटीना की. इन यूरोपीय देशों का सत्यानाश हो. खुद तो १४ टीम मैदान में उतारते हैं और अपने एशिया की चार तो लेटिन अमेरिका की छह. ऊपर से इतने हट्टे-कट्टे और चतुर-सुजान. वैसे तो अफ़्रीकी भी होते हैं इसी डील-डौल के लेकिन बेचारे ग़रीब मुल्क हैं. पेटभर खाना नसीब नहीं. डील-डौल तो भूमध्यरेखा ने नैसर्गिकली दे दिया. हट्टा-कट्टा तो अपना कल्लू रिक्शेवाला भी दिखता है लेकिन बेचारा वही जानता है कि कैसे दो जून की रोटी का जुगाड़ होता है. सत्यानाश हो म्यूनिसिपल कमेटी वालों का जो मेन रोडों पर रिक्शों की आवाजाही पर पाबंदी लगा रहे हैं.

मैं क़िस्सा ए फ़ीफ़ा कप सुना रहा था. ब्राज़ील की हार में डूबी उस रात को देर तक नींद नहीं आई. सुबह देर से सोकर उठा. नित्य कर्मों से निपटने के बाद अख़बार उठाने नीचे दरवाज़े पर आया तो देखा पड़ोसन खुश नज़र आ रही है. पड़ोसन शर्मा आंटी (मुंह पे उनको आंटी कहना ख़तरनाक है) फ़ुटबॉल की अभिजात्य दर्शक हैं. अपने बेटे को तो सारा वक़्त चिल्लाती रहती है- चिंटू !!! डोंट प्ले, इट्स टाइम टू स्टडी. लेकिन इन रातों वे मैचों का भरपूर मज़ा ले रही हैं. आंटी को प्रसन्न देख अपने को उत्सुकता हुई. मैंने पूछ ही लिया, ''आपने रात का मैच नहीं देखा क्या.'' जवाब आया- ''गए थे मैं और ये.. ली मेरीडियन में देखा था मैच. मज़ा आ गया.'' मैंने पूछा ''इसमें मज़े की बात क्या है जी. अपना ब्राज़ील तो हार गया.'' वो बोली- ''तो क्या हुआ. हॉटल में तो खूब एन्जॉय किया ना.'' ''लेकिन मैडम शर्मा, अब तो ब्राज़ील नहीं है और अर्जेंटीना भी नहीं. अब काहे का मज़ा. सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया.'' आंटी ने कहा- ''पोर्तूगाल है ना. मैंने फिर पूछा- ''क्यों अब इस पुर्तगाल में क्या है अपने जैसा.'' आंटी ने कहा- ''क्यों नहीं है. आखिर पुर्तगाल से हमारा पुराना नाता है. वास्कोडिगामा वहीं के तो थे.'' मैं समझ गया कि मैडम शर्मा भी रिलेशन मैनेज कर लेती हैं. सुना है कोलकाता वाले दुखी हैं क्योंकि अर्जेंटीना और ब्राज़ील हार गए. लेकिन गोवा वाले इन दिनों पुर्तगाल टीम पर आस लगाए बैठे हैं. पुर्तगाल बुधवार को फ़्रांस से भिड़ेगा. पुर्तगाल हार गया तो गोवा दुखी होगा. लेकिन तब पॉडिचैरी में खुशी का आलम होगा. कभी पॉडिचैरी फ़ांसिसी उपनिवेश था. वाह, क्या संबंध हैं. यही तो गुर होता है संबंध खंगालने का.
सोचो अगर कल इटली फ़ाइनल जीत गया तो कौन झूमेगा. अरे भई.. कॉग्रेसी. वे कहेंगे ''मैडम की होमटीम जीत गई बॉस.''

Friday, July 07, 2006

हम तो चले जयपुर

मित्रों,
जयपुर में ८ और ९ जुलाई को हिन्दी चिट्ठाकारों का सम्मेलन होने जा रहा है. अपन भी उसी में शामिल हो रहे हैं. लिहाज़ा अगले तीन दिनों तक ख़बरों की ऐडवांस बुकिंग का स्तंभ प्रकाशित नहीं हो सकेगा. अगला अंक ११ जुलाई की ख़बरों के साथ प्रकाशित होगा.

चिट्ठाजगत के सभी पाठकों से क्षमायाचना सहित

आपका
नीरज दीवान.

Tuesday, July 04, 2006

गुज़र रहा है अपना कारवां

बचपन से ये गीत मुझे पसंद है. सोचा ना था कि कुछ ऐसा ही गुज़रता जाएगा. ज़िंदगी का फ़लसफ़ा किताबों और गीतों से भी ज़्यादा अहम तब होता है जब वो खुद पर उतर जाए. बचपन से जवानी तक का सफ़र ऐसा चलता रहा कि यही गीत सुनने का वक़्त नहीं मिला. गोया गीत ही ढल रहा था हर क़दम पर. अंतिम बंद आशा बांधता है और अब इसी दौर से गुज़र रहा है अपना कारवां.

कई बरसों से यह गीत ढूंढ रहा था. परिचर्चा में इसका ज़िक्र किया तो सागर जी और निधि जी के प्रयासों से यह मुझ तक पहुंच ही गया. १९७५ में बनी गुमनाम-सी फ़िल्म ज़िंदगी और तूफ़ान का यह गीत लिख रहा हूं- यहां सुन भी सकते हैं. राम अवतार त्यागी इसके गीतकार हैं.

ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है
इक हसरत थी कि आंचल का मुझे प्यार मिले
मैंने मंज़िल को तलाशा मुझे बाज़ार मिले

मुझको पैदा किया संसार में दो लाशों ने
और बर्बाद किया क़ौम के अय्याशों ने
तेरे दामन बसा मौत से ज़्यादा क्या है
ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है

जो भी तस्वीर बनाता हूं बिगड़ जाती है
देखते-देखते दुनिया ही उजड़ जाती है
मेरी कश्ती तेरा तूफ़ान से वादा क्या है
ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है

तूने जो दर्द दिया उसकी क़सम खाता हूं
इतना ज़्यादा है कि एहसां से दबा जाता हूं
मेरी तक़दीर बता और तक़ाज़ा क्या है
ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है

मैंने जज़्बात के संग खेलते दौलत देखी
अपनी आंखों से मोहब्बत की तिजारत देखी
ऐसी दुनिया में मेरे वास्ते रक्खा क्या है
ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है

आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है
पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है
आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है