नाम से यूं ना समझ लें कि हम किसी राजा साहाब के यहां दीवान हैं, दरअसल दुबे कभी जाकर दीवान बन गये थे. तभी से ये सिलसिला चल पडा. पत्रकारिता करता हूं, यही पेशा भी है, दिल्ली में रहते दो साल हो चुके है और यहां मीडिया संस्थान में शोध विभाग में काम कर रहा हूं. घर-बार छोडे अरसा बीत गया. इस दरम्यां देशबन्धु, जनसत्ता, आल इंडिया रेडियो वगैरह में भी काम किया. पत्रकारों को क़लम का सिपाही कहा जाता है, लेकिन क़लम छोडे भी ज़माने बीत गए, अब इस कंप्यूटर युग में की-बोर्ड का सिपाही कहलाने से गुरेज़ नही. ख़बरों की लत ऐसी कि शायद छुटाए नहीं छूटेगी. ज़िन्दगी का आधा रास्ता यूं ही गुज़र गया अकेले- अकेले... पसंद सब कुछ है या कहूं कि खाना, पीना, गज़लें, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में विचार-विमर्श).
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Agreed
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