Sunday, July 09, 2006

संबंध खंगालने का गुर

फ़ुटबॉल में अपनी उम्मीदें ख़त्म हो गईं. हिन्दुस्तान की बात नहीं हो रही है. अपना तो नंबर ११७वां है. दुनिया में तक़रीबन २०४ देश फ़ुटबॉल खेलते हैं. सोचो यदि इतने ही देश क्रिकेट खेलते तो अपना नंबर क्या होता. यक़ीनन अपन १०० के बाहर होते. मैं बात कर रहा हूं फ़ुटबॉल विश्वकप में ब्राज़ील और अर्जेंटीना की. दोनों लैटिन देशों से उम्मीद लगाए करोड़ों लोगों की आशाओं पर पानी फेर दिया इन यूरोपियन्स ने. अपन की ब्राज़ील और अर्जेंटीना से हमदर्दी क्यों हैं. हां भई ये समर्थन नहीं हमदर्दी ही कहो. दर्द हमारा और उनका एक-सा है. अव्वल तो अपनी और उनकी चमड़ी एक जैसी है. उनका सांबा तो अपना भांगड़ा. दोनों में ज़बर्दस्त फाकां-मस्ती. तीसरा यह कि अपने यहां भी आम आदमी बसता है और उनके यहां भी. तीनों कर्ज़दार. सुना तो ये भी है कि अर्जेंटीना की माली हालत पिछले दिनों बड़ी ख़राब थी, मेरी तो अभी भी नहीं सुधरी. इंसान बड़ी आसानी से अपनी बिरादरी या बिरादरी-सा ढूंढ लेता है. इस दर्द को अपने एनआरआई साथी अच्छी तरह समझ सकते हैं.

एक कहानी याद आई- गुरू-चेला ठहरे अफ़ीमची. जा पहुंचे किसी शहर में.. शहर उनके लिए नया था सो अफ़ीम कहां मिले ये पता ना था. तभी गुरू ने अपनी घंटाली दिखाई और चेले को कहा- तू राह की दूसरी तरफ़ जाकर खड़ा हो जा, मैं इधर खड़ा होता हूं. गुरू ने पतंग उड़ाने की मुद्रा बनाई और आसमान की ओर देखने लगा. चेले ने काल्पनिक चकरी संभाल ली और ढील देने लगा गुरू को. आसपास के लोग आते-जाते रहे, किसी ने ध्यान न दिया. तभी एक आदमी दोनों के बीच में आया और धागे (जो था ही नहीं) को ऊपर उठाकर आगे बढ़ गया. गुरू-चेले ने उसको दबोचा और पूछ बैठे- बता अफ़ीम कहां मिलेगी? तो ऐसे बनता है काम.

बात हो रही थी ब्राज़ील-अर्जेंटीना की. इन यूरोपीय देशों का सत्यानाश हो. खुद तो १४ टीम मैदान में उतारते हैं और अपने एशिया की चार तो लेटिन अमेरिका की छह. ऊपर से इतने हट्टे-कट्टे और चतुर-सुजान. वैसे तो अफ़्रीकी भी होते हैं इसी डील-डौल के लेकिन बेचारे ग़रीब मुल्क हैं. पेटभर खाना नसीब नहीं. डील-डौल तो भूमध्यरेखा ने नैसर्गिकली दे दिया. हट्टा-कट्टा तो अपना कल्लू रिक्शेवाला भी दिखता है लेकिन बेचारा वही जानता है कि कैसे दो जून की रोटी का जुगाड़ होता है. सत्यानाश हो म्यूनिसिपल कमेटी वालों का जो मेन रोडों पर रिक्शों की आवाजाही पर पाबंदी लगा रहे हैं.

मैं क़िस्सा ए फ़ीफ़ा कप सुना रहा था. ब्राज़ील की हार में डूबी उस रात को देर तक नींद नहीं आई. सुबह देर से सोकर उठा. नित्य कर्मों से निपटने के बाद अख़बार उठाने नीचे दरवाज़े पर आया तो देखा पड़ोसन खुश नज़र आ रही है. पड़ोसन शर्मा आंटी (मुंह पे उनको आंटी कहना ख़तरनाक है) फ़ुटबॉल की अभिजात्य दर्शक हैं. अपने बेटे को तो सारा वक़्त चिल्लाती रहती है- चिंटू !!! डोंट प्ले, इट्स टाइम टू स्टडी. लेकिन इन रातों वे मैचों का भरपूर मज़ा ले रही हैं. आंटी को प्रसन्न देख अपने को उत्सुकता हुई. मैंने पूछ ही लिया, ''आपने रात का मैच नहीं देखा क्या.'' जवाब आया- ''गए थे मैं और ये.. ली मेरीडियन में देखा था मैच. मज़ा आ गया.'' मैंने पूछा ''इसमें मज़े की बात क्या है जी. अपना ब्राज़ील तो हार गया.'' वो बोली- ''तो क्या हुआ. हॉटल में तो खूब एन्जॉय किया ना.'' ''लेकिन मैडम शर्मा, अब तो ब्राज़ील नहीं है और अर्जेंटीना भी नहीं. अब काहे का मज़ा. सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया.'' आंटी ने कहा- ''पोर्तूगाल है ना. मैंने फिर पूछा- ''क्यों अब इस पुर्तगाल में क्या है अपने जैसा.'' आंटी ने कहा- ''क्यों नहीं है. आखिर पुर्तगाल से हमारा पुराना नाता है. वास्कोडिगामा वहीं के तो थे.'' मैं समझ गया कि मैडम शर्मा भी रिलेशन मैनेज कर लेती हैं. सुना है कोलकाता वाले दुखी हैं क्योंकि अर्जेंटीना और ब्राज़ील हार गए. लेकिन गोवा वाले इन दिनों पुर्तगाल टीम पर आस लगाए बैठे हैं. पुर्तगाल बुधवार को फ़्रांस से भिड़ेगा. पुर्तगाल हार गया तो गोवा दुखी होगा. लेकिन तब पॉडिचैरी में खुशी का आलम होगा. कभी पॉडिचैरी फ़ांसिसी उपनिवेश था. वाह, क्या संबंध हैं. यही तो गुर होता है संबंध खंगालने का.
सोचो अगर कल इटली फ़ाइनल जीत गया तो कौन झूमेगा. अरे भई.. कॉग्रेसी. वे कहेंगे ''मैडम की होमटीम जीत गई बॉस.''

10 Comments:

Blogger आलोक said...

पॉडिचैरी
पॉण्डिचेरी या फिर पांडिचेरी। चन्द्र और बिन्दु एक साथ होना चाहिए, लेकिन अफ़सोस कि वह फिर चन्द्रबिन्दु बन जाएगा, जो कि नहीं होना चाहिए।

c/फ़ांसिसी/फ़्रांसीसी

कल इटली फ़ाइनल जीत गया तो कौन झूमेगा
सही कहा!

9:37 AM  
Blogger Manish said...

मैं तो पहले से ही कार्यालय में बंगाली मित्रों की ब्राजील अंधभक्ति से परेशान था। अब आप भी उसमें कतार लगा कर शामिल हो गए। एक महान टीम जिसने पूरे विश्व कप में साधारण खेल दिखलाया, के लिये ऐसा शोक कहाँ तक जायज है। वैसे संबंध निकालने वाली बात आपने खूब कही है।
वैसे मैं तो आपकी शर्मा आण्टी की तरह पुर्तगाल को जीतते देखना चाहता हूँ। सिर्फ इस वजह से कि वो चारों में least hyped टीम है जो अच्छा खेली है।

9:40 AM  
Blogger Zebigleb said...

hi India (from France)

9:53 AM  
Blogger नीरज दीवान said...

धन्यवाद आलोक भाई.

10:11 AM  
Blogger ई-छाया said...

नीरज भाई, आपके बयान करने के तरीके का तो मै पंखा हो गया हूँ, चाहे ऐडवांस बुकिंग हो या कुछ और। वल्लाह।

11:58 AM  
Blogger Jagdish Bhatia said...

बहुत हंसाया नीरज भाई। वैसे ईटली के जीतने पर यहां स्कूलों में भी एक दिन के अवकाश की घोषणा हो सकती है।
गुरू चेले का किस्सा भी बढि़या था।

8:14 PM  
Anonymous संजय बेंगानी said...

फुटबोल-सुटबोल छोड़ो अपने को तो गुरू-चेले वाला किस्सा मजेदार लगा...और इटली के जीतने वाला विचार शुभान-अल्लाह क्या बात कही है, पता नहीं अपने कांग्रेसी बन्धू इस ओर सोच पाये हैं या नहीं.

9:32 PM  
Blogger RC Mishra said...

कुछ भी हो, इटली को जिताने :) के लिये मैने पहली बार कोई फ़ुट्बाल मैच पूरा देखा।
वो भी सुबह के लगभग ३ बजे तक और अपने इटालियन दोस्त (Colleague in Italy)को तुरन्त फ़ोन करके बधाई भी दी।

12:19 PM  
Anonymous Anonymous said...

मैने तो अगले विश्वकप तक फुटबाल से सन्यास ले लिया है... मेरी टीम (ब्राजील) हार गयी.

2:37 AM  
Anonymous Sindhu said...

वाह जनाब, वाह!
मज़ेदार लेख हैं।

4:32 PM  

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