Tuesday, July 04, 2006

गुज़र रहा है अपना कारवां

बचपन से ये गीत मुझे पसंद है. सोचा ना था कि कुछ ऐसा ही गुज़रता जाएगा. ज़िंदगी का फ़लसफ़ा किताबों और गीतों से भी ज़्यादा अहम तब होता है जब वो खुद पर उतर जाए. बचपन से जवानी तक का सफ़र ऐसा चलता रहा कि यही गीत सुनने का वक़्त नहीं मिला. गोया गीत ही ढल रहा था हर क़दम पर. अंतिम बंद आशा बांधता है और अब इसी दौर से गुज़र रहा है अपना कारवां.

कई बरसों से यह गीत ढूंढ रहा था. परिचर्चा में इसका ज़िक्र किया तो सागर जी और निधि जी के प्रयासों से यह मुझ तक पहुंच ही गया. १९७५ में बनी गुमनाम-सी फ़िल्म ज़िंदगी और तूफ़ान का यह गीत लिख रहा हूं- यहां सुन भी सकते हैं. राम अवतार त्यागी इसके गीतकार हैं.

ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है
इक हसरत थी कि आंचल का मुझे प्यार मिले
मैंने मंज़िल को तलाशा मुझे बाज़ार मिले

मुझको पैदा किया संसार में दो लाशों ने
और बर्बाद किया क़ौम के अय्याशों ने
तेरे दामन बसा मौत से ज़्यादा क्या है
ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है

जो भी तस्वीर बनाता हूं बिगड़ जाती है
देखते-देखते दुनिया ही उजड़ जाती है
मेरी कश्ती तेरा तूफ़ान से वादा क्या है
ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है

तूने जो दर्द दिया उसकी क़सम खाता हूं
इतना ज़्यादा है कि एहसां से दबा जाता हूं
मेरी तक़दीर बता और तक़ाज़ा क्या है
ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है

मैंने जज़्बात के संग खेलते दौलत देखी
अपनी आंखों से मोहब्बत की तिजारत देखी
ऐसी दुनिया में मेरे वास्ते रक्खा क्या है
ज़िंदगी और बता तेरा इरादा क्या है

आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है
पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है
आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है

2 Comments:

Blogger अनूप शुक्ला said...

खबरें छापने के अलावा इस तरह की पोस्टें भी लिखा करें इसलिये तारीफ कर रहा हूँ-बहुत अच्छा लगा।

8:04 PM  
Blogger Jagdish Bhatia said...

वाकई, किसी फ़िल्मी गीत के बोलों को इतना सीरियसली नहीं लिया। खूबसूरत शब्दों को आपके परिचय ने और भी मार्मिक बना दिया।

8:42 PM  

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