Wednesday, July 12, 2006

तेरा दर्द मेरे दर्द से ज़्यादा कैसे?

बुधवार सुबह के अख़बारों की सुर्ख़ियों में एक शब्द बार-बार दिखाई पड़ा- 7/11. ये शब्द मानो अमेरिका के 9/11 की याद दिला रहा है. पहले पहल चैनलवालों ने इस शब्द का इस्तेमाल किया. इससे तुकबंदी मालूम होती है. लेकिन पीछे का मर्म यह है कि हम दुनिया को बता रहे हैं कि अमेरिकी और उनके चाटूकार मित्र देख लें कि भारत भी आतंकवाद की आग में झुलस रहा है. मुझे याद पड़ता है ट्विन टॉवर पर अटैक के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक लाइन का बयान जारी किया था- Either you are with us, or you are with the terrorists.

सभ्यता के प्रसार के नाम पर हमले कर रहा एक शक्तिशाली देश एकध्रुवीय दुनिया के छोटे-मोटे देशों को मानो ललकार रहा हो कि या तो हमारे साथ आओ वरना आतंकवादियों में गिने जाओगे. भारतीय वक़्त के मुताबिक़ शाम का वो हादसा था और थोड़ी ही देर में जॉर्ज बुश दुनिया को एक मायने से ललकार ही चुके थे कि उसके फ़ौरन बाद हमारी सरकार को जाने कौन-सी आस बंध गई कि वाजपेयी साहब ने कह दिया- भारत आतंकवाद के ख़िलाफ़ है, हम अमेरिका को सपोर्ट देते है. तब किसी दोस्त के घर बैठा हादसे की लाइव तस्वीरें देखते हुए मैं सोच रहा था शायद वाजपेयी साहब को आस थी कि इसी बहाने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कुछ कर गुज़रने का मौक़ा मिलेगा. रात ढलते तक मुशर्ऱफ़ भी टीवी पर आए और दो बातें कह गए. पहली पाकिस्तान इस्लाम का क़िला है, देशवासी बुद्धिमानी से काम लें और दूसरी यह कि अमेरिका में हुए हादसे में हम पाकिस्तानी उनके साथ हैं. तीनों राष्ट्रप्रमुखों ने अपने राष्ट्र की ज़रूरत के मुताबिक़ बातें कह दीं थी.

हमें आस थी कि अमेरिका 1991 की तरह हमारे एयरबेस इस्तेमाल करेगा. लेकिन अमेरिका का तात्कालिक दुश्मन पाकिस्तान नहीं था. उसे तलाश थी लादेन की. कुछ अरसे पहले रूसी चंगुल से छूटे और तालीबानी हुकुमरानों में फंसे अफ़ग़ानिस्तान पर अमेरिकी प्रभुत्व जमाने का अच्छा मौक़ा था. बुश ने भारत को नज़रअंदाज़ किया और पाकिस्तान की बांहें मरोड़कर उससे वह काम करवा लिया जो पाकी राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के लिए टेढ़ी खीर था.

हम बात कर रहे थे 9/11 और 7/11 की. मुंबई में मंगलवार को हुई वारदात की ख़बर आते ही मुस्लिम चरमपंथियों पर शक़ की सुई दौड़ गई. इस तरह की वारदात उन्हीं की कारगुज़ारी हो सकती है. देश की यूपीए सरकार के पास जादुई चिराग़ नहीं है जो इन शैतानों को तुरंत-फुरत पकड़कर फांसी पर चढ़ा दे. चिराग़ तो बुश के पास भी नहीं था लेकिन हौसला था. परमाणु बम बना लेना बहादुरी की बात नहीं होती. जैसे ज़ेब में चाकू रखने से चाकू चलाने की हिम्मत नहीं आ जाती. हम होंगे परमाणु शक्ति लेकिन हिम्मत तो अपनी चाकू चलाने की भी नहीं है. संसद पर हमले के वक़्त भी वाजपेयी साहब ने आर-पार का ऐलान किया था. लेकिन वे आर ही आर रहे, कुछ दिनों में हम फिर पाकिस्तान के पार हो गए.

इस वक़्त हमारे गृहमंत्री शिवराज पाटिल से लेकर प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह सिर्फ़ आंसू बहा रहे हैं. दुनिया जानती है, भारत का बच्चा-बच्चा जानता है कि पाकिस्तान के कट्टरपंथियों ने हमारा जीना हराम कर रखा है. लेकिन उस पाकिस्तान को फटकार लगाते हुए एक लफ़्ज़ हमने नहीं कहा है. सीबीआई और रॉ जैसी एजंसियां यहां तक कि मोसाद और अमेरिकी एजंसियां भी कई दफ़ा कह चुकी हैं कि सीमापार आतंकियों के ट्रेनिंग कैंप चल रहे हैं.

हम भी जानते हैं कि आतंकी किसी धर्म-ईमान के नहीं होते. मज़हब का तो बहाना है. मुंबई में ख़ून हिन्दू का बहा है तो मुसलमान का भी. मैंने कल देखा कि कैसे कुछ मुसलमान भी हादसे के दौरान कंधे से कंधा मिलाकर अपने इंसान होने का सुबूत दे रहे थे. लेकिन पाकिस्तान के उन चरमपंथियों को मैं मुसलमान भी नहीं मानता. इनका ग़िरेबां पकड़कर पूछा जाना चाहिए कि ये सब करके वे क्या हासिल करते हैं. क्या वे यह समझते हैं कि देश के पंद्रह करोड़ मुसलमान उनके बहकावे में आ जाएंगे? जिन हिंदुओं को भी यह बदगुमानी है कि मुसलमान पाकिस्तान का ही साथ देंगे तो वे अशफ़ाक़ उल्लाह खां से लेकर राष्ट्रपति कलाम तक लंबी-चौड़ी लिस्ट बना सकते हैं. वे यह भी देख सकते हैं कि कैसे तीन-तीन युद्धों के दौरान उन्होंने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ आवाज़ें बुलंद की हैं. कुछ सुझाव सुनने में आएं हैं कि सीमापार के वे कैंप जहां अरसे से आतंकियों को तैयार किया जा रहा है उन पर हमले करने चाहिए. तब क्या अमेरिका हमें इसकी इजाज़त देगा? शायद नहीं क्योंकि पाकिस्तान से गुरेज़ रखना बुश की नीति नहीं है. वो पुचकार के चलता है मुशर्रफ़ सरकार को. बल्क़ि होना तो यह चाहिए कि हमारी सरकार ही यह ऐलान करे कि पाक सरकार ही हमें उन ठिकानों को नष्ट करने में सहयोग करे. ऐसा करते हुए हम कूटनीतिक हमले करेंगे. अमेरिका और उसके मित्र देश जब दुनियाभर में अपने हमले को जायज़ बताने के लिए साम-दाम-दंड का सहारा ले सकते हैं तो हम क्यों नहीं? हमें बातचीत के सारे रास्ते बंद करने की धमकी देनी चाहिए. अमेरिका के सामने ही यह बात रखी जाए कि आपका दर्द, दर्द है तो हमारा क्यों नहीं? पिछले पंद्रह सालों में साठ हज़ार से ज़्यादा लोगों को हमने कश्मीर में खो दिया. देशभर में कई वारदातो में हज़ारों मारे गए. फिर भड़के दंगों में करोड़ों की धनहानि और जानें गईं. किसकी शह पर? ज़ाहिर है पाकिस्तानी कट्टरपंथियों की वजह से.

पिछली दफ़ा दिल्ली दहली थी तब भी कुछ इसी तरह का मंज़र था. कोई शिक्षा नहीं ली गई. आज मुंबई फिर तड़प उठा है. कुछ दिन का हल्ला मचेगा और फिर शुरू हो जाएगा हमारा किरकिटिया उन्माद... अगले महीने श्रीलंकाई दौरे की चर्चा में हम डूबेंगे और भूल जाएंगे कि कभी मुंबई दहली थी. तब हमारी सरकार सीबीएम टाक की प्लानिंग लेकर इस्लामाबाद जाएगी और खाली हाथ वापस आ जाएगी.

9 Comments:

Anonymous संजय बेंगाणी said...

हमने इतिहास से कब कुछ सिखा हैं.

6:48 AM  
Blogger Manish said...

भारतीय विदेश नीति निर्माता आपके इस काबिले तारीफ लेख से कुछ शिक्षा लें तो देश का भला हो जाएगा।

8:11 AM  
Blogger अनुनाद सिंह said...

कब तक सुनते रहेंगे कि आतंकवादी का कोई धर्म नही होता? इसका कुछ मतलब भी निकलता है? लोगों को कब तक मूर्ख बनाते रहेंगे?

9:17 AM  
Blogger नीरज दीवान said...

अनुनाद जी, आपकी पीड़ा के पीछे का साहित्य मैंने पढ़ा है. अपने विचारों को स्पष्ट करें. हटिंगटन थ्योरी अथवा डेनियल पाइप्सनुमा विचारों पर कई दफ़ा लिख चुका हूं. अगर इससे भिन्नता हो तो स्वागत है.

10:03 AM  
Blogger Srijan Shilpi said...

जागरूकता और सतर्कता -- आतंकवादी हमलों से बचाव का यही उपाय है। पुलिस, सुरक्षा बलों, गुप्तचर बलों के साथ-साथ आम जनता को भी अधिकतम जागरूकता और सतर्कता बरतनी होगी। आतंकवाद विश्व भर में फैल चुका है और अब इसे तृतीय विश्व युद्ध की संज्ञा भी दी जा रही है। भारत ने अभी तक आतंकवाद के विरुद्ध आक्रामक रुख़ नहीं अपनाया है। शायद अगले एक दशक तक भारत की नीति रक्षात्मक ही बनी रहे। अमरीका और इज़रायल का अनुसरण करने के पक्ष में भारत में कोई राजनीतिक माहौल बनने के आसार फिलहाल नहीं हैं। हमारे यहाँ का बौद्धिक वर्ग भी केवल फ़िजूल की बातें बनाना जानता है, उसके पास आतंकवाद से निपटने की कोई सुविचारित रणनीति नहीं है।

आतंकवादियों को तैयार करने और आतंकवादी हमलों की योजना बनाने और उन्हें कार्यान्वित करने में जिस तरह का समर्पित, संगठित और सुनियोजित नेटवर्क कार्यशील है, आतंकवाद से निपटने के लिए उससे अधिक कारगर और दक्ष नेटवर्क की आवश्यकता है। आतंकवादी जहाँ जान की बाजी लगाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं, वहाँ हमारे अधिकतर सुरक्षा बल नौकरी करने की मानसिकता से परिचालित होते हैं। जो जवान देश और समाज की सुरक्षा के लिए वास्तव में जान की बाजी लगाते हैं वे अत्यंत ही निर्धन परिवारों के मजबूर, बेबस लोग होते हैं जबकि पुलिस, सेना और गुप्तचर बलों के वरिष्ठ अधिकारी अतिसुरक्षित घेरों के दायरे में रहते हैं। हमारे यहाँ के सबसे कुशल सुरक्षा दस्ते राजनेताओं की सुरक्षा में लगे रहते हैं। आम जनता की जान की फ़िक्र किसे है?

10:34 AM  
Blogger नीरज दीवान said...

भारत की मिश्रित संस्कृति के मद्देनज़र ही कोई कारगर नीति अपनाई जाए. अमेरिका से तारतम्यता की गुंजाइश मुझे दिखती है किंतु इज़रायल का परिदृश्य बिलकुल भिन्न है और इस पर विचारना अपनी पहचान खोने के समान है. सुरक्षा तंत्र पर केंद्रित सृजनशिल्पी जी के बाक़ी विचारों से मैं सहमत हूं. धन्यवाद

10:49 AM  
Anonymous Tarun said...

ऐसा ही कुछ रोना हम भी रो लिये

8:36 PM  
Blogger Sagar Chand Nahar said...

नीरज भाई
बहुत कड़वा सच लिखा है कि हम कुछ ही दिनों में यह सब भूल कर फ़िर से किरकिटिया उन्माद में सब कुछ भूल जायेंगे, आखिर मोटी चमड़ी के जो हो गये हैं। जब तक मेरा खुद का कुछ बुरा नहीं होता मैं यह सोच कर चुपचाप बैठा रहता हुँ कि मुझे क्या? जिस दिन मेरा अहित होगा उस दिन में सरकार से लेकर आतंकवादी सबके सब को कोसना शुरु कर दूँगा।

11:02 PM  
Anonymous Anonymous said...

नीरज भैया
बहुत सार्गर्भित लेख लिखे हो। क्या आप होशन्गाबाद के रहने वाले हो।
दीपक गुप्ता

2:15 PM  

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