Friday, August 25, 2006

किसकी छींक से हिल सकती है सरकार

किसकी छींक से हिल सकती है सरकार
दैनिक जागरण, २५ अगस्त २००६
नई दिल्ली, भाषा। गुजरात लोकसेवा आयोग की एक परीक्षा में अभ्यर्थियों से एक विचित्र सवाल पूछा गया कि प्रकाश करात, ज्योति बसु, एम करुणानिधि और लालू प्रसाद में से किसकी छींक से संप्रग सरकार अस्थिर हो सकती है। राज्यसभा में शून्यकाल के दौरान कांग्रेस के नारायण सामी ने यह मामला उठाते हुए कहा कि यह प्रश्न गुजरात पशुपालन विभाग के तृतीय श्रेणी के अधिकारी पद के लिए हुई परीक्षा में पूछा गया। उन्होंने कहा कि यह सवाल विषय का संप्रदायीकरण करने के अलावा कुछ और नहीं है। कांग्रेस सदस्य ने कहा कि इसमें एक सवाल किया गया था कि किस दिन को अल्पसंख्यक काला दिवस और संघ परिवार विजय दिवस के रूप में मनाता है।

इसी महीने आई दूसरी ख़बर यहां देखें-
The Times of India Online
'Who's for conversion, Sonia or the Pope?'
Leena Mishra 8 Aug, 2006

Who said 'Christians have the right to convert?' - Sonia Gandhi, Sister Nirmala, Pope Benedict, Father Prakash.

After whom has Narendra Modi named India's biggest gas project on the Krishna Godavari basin? - Maharana Pratap, Dr Hedgewar, Syama Prasad Mookerjee, Pandit Deendayal Upadhyay.

Which day is observed as 'Black Day' by minorities and 'Victory Day' by RSS? - September 11, July 2, January 26, December 6.

These aren't samples of questions to qualify for RSS, but some of the questions asked by Gujarat Public Service Commission (GPSC) of candidates appearing for Ayurvedic medical officers' exam on Sunday.

Outraged candidates were foxed to find that many questions had blatant political or communal overtones. Four of the questions dealt with chief minister Narendra Modi's achievements.

Of the 100 questions asked in the objective paper offering four options each, about 14 were political in nature, bearing communal overtones or mocking Union railway minister Lalu Prasad or the UPA government. A copy of the 16-page question paper is with TOI.

The exam, which is meant for qualified Bachelor of Ayurvedic Medicine and Surgery (BAMS) candidates, came as a shock to many. Candidate Devang Bhavsar, an ayurveda practitioner, told TOI: ''There was also a question on which historic Supreme Court judgement cited a decision by the Narendra Modi government?'', expecting the candidates to know about the cow-slaughter ban.

"Normally, this exam is supposed to be on general knowledge, math, history and geography, but Sunday's question paper was shocking," said Bhavsar.

There were also questions about the controversial cartoons on Prophet Mohammad, and Aamir Khan film Fanaa.

Wednesday, August 23, 2006

ये कैसी शिक्षा ?

कट्टरता की ज़ुबानी है यह ख़बर. मध्य-पूर्व में फ़लस्तीन और इज़रायल संघर्ष यूं ही चलता रहेगा जब तक कि दोनों मुल्कों के लोग अपने लोगों को इस तरह शिक्षा देंगे. साढ़े तीन साल की बच्ची के दिमाग़ में इस तरह की शिक्षा देने का मतलब यही है कि क़ौमें अपने यहां भविष्य के आत्मघाती दस्ते तैयार कर रही हैं. भारत के संदर्भ मे जब शैक्षणिक सामग्री की सोचता हूं तो इसकी तुलना में अत्यल्प प्रतीत होता है. इक़रा टीवी सउदी अरब पर यह प्रसारण २००२ में किया गया था. आप स्वयं इस बच्ची बसमल्लाह के बयान ध्यान से सुनें. वैसे अंग्रेज़ी में ट्रांस्क्रिप्ट भी दी गई है.

Tuesday, August 22, 2006

मदद करें

ब्लॉगस्पॉट का यह चिट्ठा अब तकनीकी कारणों से मुझसे खुल नहीं पाता. ब्लॉगर लागिन एरर बताता है. गूगल हेल्प ग्रुप की मदद भी ली किंतु समस्या यथावत है. उस्तादों की कोशिशें भी नाकाम रहीं. जब से चिट्ठे को बीटा में घुसाया है तब से ही इसने हमको 'नेकी कर और जूता खा' की तर्ज पर धक्का मारकर भगा दिया. पता नहीं क्या होगा आगे.. यह पोस्ट यू ट्यूब की मेहरबानी से आप तक पहुंच रही है. क्योंकि अपन ने सेटिंग्स में चिट्ठे को पहले से ही डालकर रखा था.

अनुरोध है कि कोई मदद करे. इसी तरह नाकामी ही हाथ लगती रही तो यहां से पलायन के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा. गब्बर सिंह मैं आ रहा हूं.. वर्डप्रेस पर

Diet Coke+Mentos=Human experiment: EXTREME GRAPHIC CONTENT

Diet Coke + Mentos

Diet Coke and Mentos explode when mixed!

दुनिया का सारा विज्ञान शरीर से कार्बन डाइ आक्साइड बाहर रखने की बात करता है. कोक-पेप्सी पीकर लोग काहे पेट में हवा डालते हैं. चलो मर्ज़ी आपकी लेकिन इतनी हिदायत है कि मेंटोज़ खाने के बाद कोकाकोला मत पीना भैये..
वैज्ञानिक विश्लेषण आमंत्रित हैं.

Wednesday, August 16, 2006

मौत का तमाशा

Free Image Hosting at www.ImageShack.us कुछ खबरें स्वतन्त्रता दिवस की नेताओं के भाषणों मे दबकर रह जाती है। आइये आपको एक सच्ची खबर से रुबरु करवाए, जिसके बारे मे सुनकर हमारा सिर शर्म से झुक जाना चाहिए।

यह दु:खद खबर स्वतन्त्रता दिवस के दिन घटित हुई। कल स्वतन्त्रता दिवस के दिन जब प्रधानमन्त्री लाल किले की प्राचीर से गरीबी और आतंकवाद के लड़ाई छेड़ने का आह्वान कर रहे थे, लगभग उसी समय बिहार के गया में मनोज मिश्र नाम का यह ग़रीब व्यक्ति, सरकारी डेयरी में अपना बकाया ना मिलने की वजह से आत्मदाह कर रहा था। बाद में अस्पताल में डाक्टरों ने उसको मृत घोषित कर दिया। गया के एसपी अमित कुमार जैन ने बताया कि मनोज एक ट्रांसपोर्ट कंपनी चलाता था। उसका आरोप था कि बिहार सरकार की 'सुधा डेयरी' पर उसके दो लाख रुपये से अधिक बकाया हैं। जो उसे नहीं दिए जा रहे। यही नहीं, डेयरी के अधिकारियों ने दूध और अन्य उत्पादों को लाने ले जाने के लिए उसके बजाय किसी अन्य ट्रांसपोर्टर को नियुक्त कर दिया। ऐसे हालात ने उसे कर्जदार बना दिया और परिवार के सामने भुखमरी के हालात उत्पन्न हो गए।
सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस व्यक्ति को आत्मदाह करने के लिये उकसाने वाले टेलीविजन मीडिया के लोग थे। किसलिए? अपने घटिया स्वार्थों के खातिर। वहाँ पर मौजूद मीडिया के लोगों ने इस जलते हुए व्यक्ति के हर एंगिल से फोटो खींचे और वीडियो बनायी, लेकिन किसी भी व्यक्ति मे इतना साहस नही था कि इस व्यक्ति को बचाएं। लगभग हर न्यूज चैनल वाला घटना स्थल पर मौजूद था, लेकिन उसे किसी ने क्यों नही रोका? हम पूछते हैं कि ये ख़बर-ख़बर चिल्लाने वाले, रोज़ सनसनीखेज़ ख़बरों का भोपूं बजाने वाले शिखंडी क्यों मौन रहे एक युवक को जलता देखकर?
सबने टीवी पर देखा था कि मनोज ने कैसे माचिस की पहली तीली जलाई और आग पकड़ने में तीन से चार मिनट का वक़्त लगा.. तब तक उछलकर पकड़ लेना था..जब वो जल गया और ज़मीन पर लोटने लगा तो पीछे से आवाज़ सुनाई दे रही थी कि पानी लाओ..पानी लाओ. पहले क्यों नही कोई आगे बढा? उनके हाथों मे मेहंदी लगी थी? या उनके क़दम दिल्ली/मुम्बई मे बैठे उनके आकाओं ने रोक रखे थे या फिर वे भी मौत के तमाशे को दुनिया को दिखाकर अपनी टीआरपी बढाना चाहते थे? जब वो बंदा जल गया तो पुलिस की आमद देखते ही मीडिया वाले भाग खड़े हुए। ये कैसी पत्रकारिता है? हम किधर जा रहे है?

दूसरी तरफ़ कुछ टीवी चैनलो ने चतुराई दिखाई, इससे पहले कि कोई और सवाल उठाए, उन्होने खुद ही दूसरे चैनलों पर धावा बोल दिया। अरे तुम्हारे बन्दे भी तो वहाँ पर थे? वो क्या तेल बेच रहे थे? या भांग खाकर सोए हुए थे? या तुमने उनको मना कर रखा था, ब्रेकिंग न्यूज बनाने के लिए। अगर कोई दूसरा पत्रकार इस तरह जल रहा होता तो क्या नही बचाते? अगर इन पत्रकारों का कोई रिश्तेदार जल रहा होता तो क्या पुलिस, एम्बुलेन्स को फोन नही करते? लेकिन नही, इन मीडिया रिपोर्टरों ने पुलिस को फोन करने के बजाय अपने आकाओं को फोन किया कि ब्रेकिंग न्यूज बन रही है बताओ किस किस एंगिल से शूट करना है। क्या यही है पत्रकारिता धर्म?

मेरा कहना है कि सिर्फ़ चिल्लाने से कुछ नहीं होगा. वे तमाम मीडिया कर्मी जिन्होंने मिश्रा को उकसाया और जलने में मदद पहुंचाई.. उन्हें नौकरी से निकाल देना चाहिए. पुलिस की कार्रवाई अलग से हो। अब देखते है हाथों मे चूडि़या पहने और हाथ पर हाथ धरकर बैठने वाले ब्रॉडकास्ट मीडिया के आकाओं का इस मसले पर क्या रवैया रहता है? पुलिस क्यों डर रही है मीडिया पर हाथ डालने से.. नामजद रपट क्यों दर्ज नहीं की गई. जबकि दुनिया ने देखा कि कैसे स्टार, एनडीटीवी, ज़ी न्यूज़ और राष्ट्रीय सहारा पर फुटेज दिखाए गए थे. ये सीन कहां से आ गए? सबको नोटिस भेजा जाना चाहिए.

पत्रकार राष्ट्र के पहरी होते है,सूचना देना इनका कर्तव्य होता है, लेकिन संवेदनहीनता की हदे पार कर गए है ये लोग।मीडिया मे होने से पहले ये इन्सान है, ये लोग इन्सानियत का पाठ कैसे भूल गए? अगर ये इनमे इन्सानियत नही बची तो पत्रकारिता जैसे गरिमामय पेशे मे इनका कोई स्थान नही होना चाहिए।ऐसे लोगो को तुरन्त दन्डित किया जाना चाहिए। वे तमाम मीडिया कर्मी जिन्होंने मिश्रा को उकसाया और जलने में मदद पहुंचाई, उन्हें तुरन्त नौकरी से निकाल देना चाहिए। पुलिस की कार्रवाई अलग से हो। अब देखते है हाथों मे चूडि़या पहने और हाथ पर हाथ धरकर बैठने वाले इलेक्ट्रानिक मीडिया के आकाओं का इस मसले पर क्या रवैया रहता है। दूसरी तरफ़ पुलिस भी निष्पक्ष होकर काम नही कर रही। पुलिस क्यों डर रही है मीडिया पर हाथ डालने से? नामजद रपट क्यों दर्ज नहीं की गई? जबकि दुनिया ने देखा कि कैसे स्टार, एनडीटीवी और ज़ी और सहारा पर फुटेज दिखाए गए थे. ये सीन कहां से आ गए? इन सभी चैनलों को नोटिस भेजा जाना चाहिए।

हमारा कहना है :
१.मनोज मिश्रा के परिवार को ये चैनल वाले आर्थिक मदद देकर अपने पाप का प्रायश्चित करें।
२.मौत का नंगा नाच देखते हुए खामोश रहने वाले तथाकथित पत्रकारों को नौकरी से निकाला जाए।
३.पुलिस प्रशासन इनके ख़िलाफ़ नामजद रपट दर्ज करे और आगे की क़ानूनी कार्रवाई करे।४. सरकार मिश्रा के परिवार को बकाया रकम का भुगतान तुरंत करें।

मुझे पता है आपको इस खबर को अखबारों मे ढूंढने मे परेशानी होगी, इसलिए सारे लिंक यहाँ दे रहा हूँ
टाइम्स ऑफ़ इंडिया
राष्ट्रीय सहारा
अमर उजाला
पटना डेली


आखिरी खबर मिलने तक :धारा ३०६ के अंतर्गत उकसावे के लिए अज्ञात मीडियाकरों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कर लिया गया है. लेकिन अनाम के ख़िलाफ़ रपट दर्ज क्यों हुई है? जबकि पुलिस और लोगों को साफ़ पता है कि वहां कौन कौन मौजूद था. फिर क्यों नाम नहीं डाले गए प्रथम सूचना रपट में?जबकि एसपी अमित जैन का कहना है कि मीडिया कर्मी मनोज के साथ ही पहले से मौजूद थे और उन्होंने ही जलने के लिए डीज़ल का जुगाड़ कराया था।

इन पत्रकारों के ख़िलाफ़ कौन-सा दंड तय किया जाना चाहिए ये जनता तय करे। आप अपने विचार टिप्पणी मे अथवा अपने ब्लॉग पर लिखें।

Monday, August 14, 2006

ऐ ग़म ए दिल क्या करूं

Free Image Hosting at www.ImageShack.us दो महीना पहले जब मैंने टाइम की आवरण कथा पढ़ी तो कुछ भी अप्रत्याशित नहीं लगा. यह माहौल तीन साल पहले देश की एनडीए सरकार ने सरकारी खज़ाने से करोड़ो खर्च कर बनाया था. जिसे बाद की सरकार ने जारी रखा है. पूरा तंत्र इस जाल में फंसा नज़र आता है. चमचमाती कथाएं देखकर उनकी बांझे खिल जाती है जो इंडिया को आगे जाता देखना चाहते हैं. चाहे भारत पीछे छूट जाए. इस तरह के माहौल में भारत में निवेश की संभावनाओं के द्वार पर स्वर्णजड़ित तोरण लटकाया जाता है जहां यह बताने की कोशिश होती है कि भारत अब पिछड़ा नहीं रहा. क्योंकि चंद सरमायेदारो की पूंजी में हो रहा दोगुना- तिगुना इज़ाफ़ा और सरकारी सट्टा बाज़ार का उछाल पूरे देश की माली हालत का थर्मामीटर बन गया है. करोड़पतियों की तादाद में बढ़ोतरी की ख़बरों से हमें सुकून मिलता है. करोड़पतियों की तादाद में तो हम चीन के मुक़ाबिल तेज़ी से बढ़ रहे हैं. पिछले दिनों एक ख़बर छपी थी. अख़बार में थोड़ी-सी जगह मिली थी इसे. ख़बर थी कि चीन में वालमार्ट के २० मॉल्स में काम करने वाले मज़दूर संगठनों को चीन सरकार की मंज़ूरी मिल गई. मैं अपने यहां झांक रहा था. सोच रहा था कि खुली अर्थव्यवस्था के बीच श्रमिक-कामगारों के हितों का संरक्षण कैसे किया जाए. यहां कौन है अपना. जिन्हें आज़माया वे तो खिड़की के बजाए दरवाज़े खोलकर बैठ गए हैं. ख़बर सुनने मिली है कि स्पेशल इकॉनॉमिक ज़ोन में अब सरकार हायर एंड फ़ायर पॉलिसी लाने जा रही है. पिछले साल हुए गुड़गांव लाठी चार्ज की याद आ गई. वहां के मज़दूरों ने भी ऐसे ही किसी संगठन के लिए लेबर ऑफ़िस में दरख्वास्त दायर की थी लेकिन सरकार-कंपनी की सांठगांठ से फ़ाइल अटक गई. मुझे कोफ़्त नहीं कि कौन अपनी तिजोरियां बेहिसाब भर रहा है. तकलीफ़ तो भारी और भयावह असमानता को लेकर होती है. अच्छा होगा कि उनकी सुध लगातार ली जाए जो वंचित हैं. वरना हम किस मुंह से अपने देश को लोककल्याणकारी राज्य कह सकते हैं. बहुत-सी बातें हैं जो दिल करता है कहूं या आपसे सुनूं. फ़िलहाल इतना ही दोहरा सकता हूं जो मजाज़ लखनवी (असरार उल हक़) कह गए हैं....

शहर की रात और मैं नाशाद-ओ-नाकारा फिरूं
जगमगाती जागती सडकों पे आवारा फिरूं
ग़ैर की बस्ती है कब तक दर-बदर मारा फिरूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

झिलमिलाते क़ुमक़ुमों की राह में ज़ंजीर सी
रात के हाथों में दिन की मोहनी तस्वीर सी
मेरे सीने पर मगर दहकी हुई शमशीर सी
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

ये रुपहली छांव ये आकाश पर तारों का जाल
जैसे सूफ़ी का तस्व्वुर जैसे आशिक़ का ख़्याल
आह लेकिन कौन जाने कौन समझे जी का हाल
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

फिर वो टूटा इक सितारा, फिर वो छूटी फुलझड़ी
जाने किसकी गोद में आई ये मोती की लड़ी
हूक-सी सीने में उट्ठी, चोट-सी दिल पर पड़ी
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

रात हंस हंसके ये कहती है कि मैख़ाने में चल
फिर किसी शाहनाज़े-लाला-रुख़ के काशाने में चल
ये नहीं मुमकिन तो फिर ऐ दोस्त वीराने में चल
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

हर तरफ़ है बिखरी हुई रंगीनियां रानाइयां
हर क़दम पर इशरतें लेती हुई अंगडाइयां
बढ रही है गोद फैलाए हुए रुसवाइयां
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

रास्ते में रुक के दम ले लूं मेरी आदत नहीं
लौटकर वापस चला जाउं मेरी फ़ितरत नहीं
और कोई हमनवां मिल जाए ये क़िस्मत नहीं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

मुन्तज़िर है एक तूफ़ाने-बला मेरे लिए
अब भी जाने कितने दरवाज़े हैं वा मेरे लिए
पर मुसीबत है मेरा अहदे-वफ़ा मेरे लिए
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

जी में आता है अब अहदे-वफ़ा भी तोड़ दूं
उनको पा सकता हूं मैं, ये आसरा भी छोड़ दूं
हां मुनासिब है, ये ज़ंजीरे-हवा भी तोड़ दूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

इक महल की आड से निकला वो पीला माहताब
जैसे मुल्ला का अमामा जैसे बनिए की किताब
जैसे मुफ़लिस की जवानी जैसे बेवा का शबाब
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

दिल में इक शोला भड़क उठा है, आख़िर क्या करूं
मेरा पैमाना छलक उठा है, आख़िर क्या करूं
ज़ख्‍म सीने में महक उठा है, आख़िर क्या करूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

जी में आता है ये मुर्दा चांद तारे नोच लूं
इस किनारे नोच लूं और उस किनारे नोच लूं
एक दो का ज़िक्र क्या सारे के सारे नोच लूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

मुफ़लिसी और ये मज़ाहिर हैं नज़र के सामने
सैकडों चंगेज़ो नादिर हैं नज़र के सामने
सैकडों सुलतानो जाबिर हैं नज़र के सामने
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

बढ के इस इन्द्रसभा का साज़ ओ सामां फूंक दूं
इस का गुलशन फूंक दूं उसका शबिस्तां फूंक दूं
तखते सुलतान क्या मैं सारा क़स्र ए सुलतान फूंक दूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं


मायने - नाशादो-नाकारा-उदास और बेकार, क़ुमक़ुम- बिजली की बत्ती, शमशीर- तलवार, तसव्वुर- अनुध्यान, मैखाना- मधुशाला, शहनाज़े लाला रुख़- लाल फूल जैसे मुखड़े वाली, काशाने- मकान, इशरत- सुखभोग, फ़ितरत- स्वभाव या प्रकृति, हमनवा- साथी, तूफ़ाने-बला- विपत्तियों का तूफ़ान, वा- खुले हुए, अहदे-वफ़ा- प्रेम निभाने की प्रतिज्ञा, माहताब-चांद, अमामा- पगड़ी, मुफ़लिस- ग़रीब, शबाब- यौवन, मज़ाहिर- दृश्य, सुल्ताने जाबिर- अत्याचारी बादशाह, शबिस्तां- शयनागार, क़स्रे सुल्तान- शाही महल


चमचमाती ख़बरों से दूर किन्हीं कोनों के अंधेरों में बैठी इन ख़बरों पर नज़र डालें

मनमोहन के दौरे के बाद भी १०८ किसानों ने आत्महत्या की
८० साल के ग़फ़्फ़ार की व्यथा- जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहां है

क्या आम आदमी पर नज़र है अदालतों की

अन्याय और दुर्दशा ही जिनकी नियति है

'मैं आज भी बाज़ार में बैठी हूँ'
लाखों बच्चे भूखे सोते हैं: यूनिसेफ़ (भारत के संदर्भ पढ़ें)

केरल में आत्महत्या को मजबूर किसान
ऊँची विकास दर मगर बेरोज़गारी बढ़ी

Thursday, August 10, 2006

रिश्ते की डोर और स्पर्श मात्र ने दी एक नई जिदंगी

अमर उजाला से साभार


गाजियाबाद. प्रार्थना करो कि चेतना के इस स्पर्श को हर कोई महसूस करे. रक्षा बंधन पर बहुतों ने राखी बांधी और बहुतों ने राखी बंधवाई लेकिन एक राखी ऐसी भी थी जिसकी जुबां नहीं थी. वह सिर्फ अहसासभर थी. मजहब के पार. जातिबंधन-खून के रिश्तों के पार. एक माह से अवचेतन चल रहे गर्वनर का हाथ बढ़ा और मुसलिम नर्स ने प्यार की प्रतीक राखी कलाई पर सजा दी--तुम जियो हजारों साल.

इसे ईश्वर की माया या कुदरत का करिश्मा ही कहेंगे कि भाई को बहन मिली तो सिर्फ स्पर्श से. एक माह पहले गर्वनर एक्सीडेंट में गंभीर रूप से घायल हो गया था. तभी से वह कोमा में चल रहा है. आईसीयू में भरती होने से परिजन भी ज्यादा नहीं मिल पाते थे. गर्वनर की सेवा करती थी एक नर्स सबीना नाज। सबीना के ही स्पर्श को गर्वनर महसूस करता था. जब भी वह उसके सिर पर हाथ रखती तो गर्वनर को लगता कि कोई अपना ही उसका हाल जान रहा है. यह केवल आंतरिक अनुभूति थी लेकिन इसी ने दोनों को प्यार के असीम रिश्ते से जोड़ दिया.
डाक्टरों ने गवर्नर को लगभग 25 दिन तक आईसीयू में रखा और इसी दौरान उसके सिर का बेहद नाजुक ऑपरेशन भी हुआ. इसके बाद धीरे-धीरे उसकी हालत में थोड़ा सुधार आया और अभी चार दिन पहले उसे आईसीयू से कमरा नं 201 में शिफ्ट किया गया है. यहां पर वैसे तो गवर्नर की सेवा अस्पताल स्टाफ और उसके परिजन सभी लोग कर रहे हैं लेकिन जब शबीना ने उसे स्पर्श किया तो गवर्नर के हाथ को थोड़ा जकड़ लिया. इस दृश्य को देखकर गवर्नर के परिजन हैरान रह गए. उन्हें लगा कि गवर्नर सबीना के स्पर्श को अर्ध कोमा में भी महसूस करता है. इधर गवर्नर के इस एहसास ने शबीना के मन को झकझोर दिया और उसने गवर्नर को अपना भाई बनाने का फैसला कर डाला.

गवर्नर हिंदू है और सबीना मुस्लिम. इसके बावजूद आज सबीना ने सभी धर्म जाति के बंधन को दरकिनार कर रक्षाबंधन के अवसर गवर्नर को अपना भाई मानते हुए राखी बांधी. सबीना ने न सिर्फ सामाजिक भेदभाव को मिटाने का प्रयास किया है बल्कि कौमी एकता की एक ताजा मिसाल भी पेश की है. ...और साथ-साथ रक्षा बंधन के असली सूत्र को भी साकार किया, बहन ने भाई के जिंदगी की प्रार्थना की और भाई ने बहन की रक्षा का संकल्प लिया. गवर्नर भले होश में नहीं, लेकिन सबीना कहती है कि रिश्ते की यह डोर कभी नहीं टूटने वाली है.
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समाचार लिखने वाले पत्रकार को मेरी ओर से धन्यवाद.

Wednesday, August 09, 2006

अमेरिकी षडयंत्र या गर्दन बचाने की कवायद ?

तेल का खेल- भाग २
टवर सिंह जब अमेरिकी दौरे पर थे, तब उन्होंने इराक़ में सेना भेजने की वक़ालत की थी. जिसकी भारत में ज़बर्दस्त आलोचना हुई. (9 जून 2004) "There is a resolution of the last Parliament on this issue in which we had given our opinion that we were against sending troops to Iraq. Now the situation has changed. There is a resolution unanimously passed in the United Nations and there are Arab members in it. We will look at it very carefully. But I must emphasize that this matter will have to be placed before the government at the highest levels, so it would be premature for me to say aye or nay," he said after a 60-minute meeting with U.S. Secretary of State Colin Powell. He has been criticized by the chief opposition party, the Bharatiya Janata Party for these remarks and for making contradictory statements on India's policy on Pakistan.

बीबीसी केहार्ड टाक प्रोग्राम में नटवर ने भारत की विदेश नीति में बदलाव के संकेत देते हुए यह भी कहा था कि भारत नेपाल को सैन्य सहायता देगा. इस मुद्दे पर अब भी वामपंथी राज़ी नहीं हैं. (जून 2004)

नटवर सिंह के विदेश मंत्री होते हुए भी भारत ने विएना में इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी की बैठक में अमेरिकी प्रस्ताव के समर्थन में और ईरान के ख़िलाफ़ वोट किया था. जिसकी वामदलों ने तीखी आलोचना की थी. बाद में प्रधानमंत्री को लीपापोती करनी पड़ी. (1 अक्टूबर 2005)

नटवर अपनी ही सरकार के मुखिया से यह कह रहे थे कि एटमी क़रार को लेकर देश में अलग-अलग तरह की राय है. और प्रधानमंत्री को संसद में बयान देना चाहिए. उनका कहना था कि, "... my disquiet began on April 5, when Secretary of State Condoleezza Rice testified in the House (US Congress) Select Committee and International Committee.
It may be recalled that Bush, from the day he entered the White House, wanted very close relations with India. This was in contrast to (Bill) Clinton, who pilloried us with sanctions after the nuclear tests. Bush has been consistently positively focussing on India. Americans agreed from July 18 to March this year that Indo-US nuke deal will be reciprocal.
But, difficulties began when Rice in the Select Committee used the word ‘‘unilateral.’’ I wrote to the PM to assuage the misgivings of people, our friends had genuine doubts, a national consensus was important. Even the scientific community and the foreign services are divided...but, Rice went beyond NPT. We had never agreed to that." INDIAN EXPRESS फ़िलहाल बीजेपी और वामदल दोनों इसके ख़िलाफ़ नज़र आ रहे हैं.

क्या नटवर सिंह यह कहना चाहते हैं कि 18 जुलाई के एग्रीमेंट, जिसके नटवर Principal Architect थे- के बाद एग्रीमेंट में बेसिक चेंज किए गए? नटवर सिंह साफ़ बताएं कि 18 जुलाई 2005 के बाद ऐसे क्या compulsions थे कि क़रारनामे में इतने Basic Changes कर दिए गए? Is there a pro-US tilt in foreign policy?

जिस तरह से अमेरिकी सीनेट में सीनेटर कैरी, कॉग्रेसमैन टाम लेंटास, सीनेटर सरबैन्स ने एटमी क़रार को लेकर जो बयान दिए हैं, उनमें क़रारनामे के बारे में परस्पर की बजाए एकपक्षीय शब्द सुनाई दे रहे हैं. क्या यह क़रार कुलमिलाकर भारत की तुलना में अमेरिकी हितों की पूर्ति ‍ज़्यादा करता नज़र आ रहा है?

Sunday, August 06, 2006

तेल का खेल- बड़ी मछलियां बच निकलीं

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भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रामस्वरूप पाठक की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंपी. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक पाठक समिति ने अपनी 110 पेज की रिपोर्ट में कहा है कि तेल के बदले अनाज कार्यक्रम के तहत तेल के कूपन दिलाने में नटवर सिंह और उनके बेटे जगत सिंह की भूमिका थी. रिपोर्ट कहती है कि, ''There may not be any money deal associated with them, but for sure they are guilty of misconduct, of misusing their positions''.
हालांकि पाठक समिति की रिपोर्ट के हवाले से टेलीविज़न चैनलों में काफ़ी कुछ कहा जा रहा है लेकिन अभी इस बात की कोई अधिकृत जानकारी नहीं मिल पाई है कि रिपोर्ट में वास्तव में क्या-क्या कहा गया है. पाठक पैनल की रिपोर्ट पर हालांकि officially disclose नहीं हुई है. ख़बरें हैं कि पैनल ने माना है कि नटवर सिंह और जगत सिंह ने इस पूरे ऑयल स्कैम में positions (as senior congress leader and former foreign minister) का misuse किया है.

कैसे-क्या हुआ (संक्षेप में)


  • नवम्बर 2000 में इराक़ के उपराष्ट्रपति रमादान अपने तेल मंत्री के साथ भारत आए, तेल कूपनों पर शुरुआती बातचीत उसी दौर में हुई.

  • पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने अपने नाम से इराक़ का निमंत्रण पत्र हासिल किया और फिर कॉग्रेस नेतृत्व (सोनिया गांधी) से चार सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल को 17 से 24 जनवरी 2001 तक इराक़ भेजने के लिए अनुमति ली. बाद में इसमें नटवर ने जगत और अंदलीब को भी शामिल कर लिया.

  • नटवर सिंह जी के क़रीबी रहे क्रोएशिया के पूर्व राजदूत अनिल माथेरानी का कहना है कि नटवर सिंह ने 2001 के दौरे का इस्तेमाल जगत और सहगल को तेल के बदले अनाज कार्यक्रम में फ़ायदा पहुंचाने के लिए ही किया था. बाद में माथेरानी यह कहकर पलट गए थे कि यह इंडिया टुडे के साथ ऑफ़ द रिकॉर्ड बातचीत थी. (इंडिया टुडे का इंटरव्यू)

  • अक्टूबर 2005 में जारी पॉल वोल्कर रिपोर्ट में कहा गया था कि नटवर और कॉग्रेस पार्टी ने चालीस लाख बैरल तेल हासिल करने के लिए इराक़ में सद्दाम हुसैन सरकार को ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से सरचार्ज दिया और फिर बाद में उस तेल को मुनाफ़े के लिए एक स्विस कंपनी मेसफ़ील्ड एजी के ज़रिए अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में बेच दिया. यह तेल कूपन अंदलीब को मिला जिसने इसी स्विस कंपनी को बेचा.


पाठक पैनल की रिपोर्ट पर नटवर-जगत की सफ़ाई
जगत और नटवर सिंह कहते हैं कि पाठक पैनल का यह कहना कि Position का misuse किया गया था जबकि वे उस दौर में नटवर ना तो सरकार में थे और ना ही जगत सिंह विधायक थे. लेकिन यह तो सभी मानते हैं कि नटवर सिंह अनुभवी विदेश मंत्री रहे हैं. वे कॉग्रेस के वरिष्ठतम सदस्यों में से हैं. गांधी परिवार के नज़दीकी रहे हैं. सद्दाम हुसैन से नज़दीकी रिश्ते रहे हैं. वे खुले तौर पर अमेरिका विरोधी बयान भी देते रहे हैं. आज नटवर इस पूरे मामले को अमेरिका की साज़िश भी क़रार देते हैं. यानी नटवर की शख़्सियत इतनी तो है कि बिना मंत्री होते हुए भी वे डील को अंजाम तक पहुंचा सकते थे.

जगत सिंह ने मामले का खुलासा होते ही कहा था कि वे कॉग्रेस डेलीगेशन का हिस्सा थे. लेकिन जब रणदीप सुरजेवाला ने खुलासा किया कि जगत सिंह उस डेलीगेशन में नहीं थे तो जगत पलट गए और कहा कि वे नटवर के बेटे के तौर पर वहां थे. इस मामले में माथेरानी कहते हैं कि नटवर सिंह ने इराक़ी न्यौते को अपने बेटे को अपने साथ ले जाने के लिए इस्तेमाल किया क्योंकि उनकी उम्र के किसी शख्स के लिए वहां पहुंचना आसान नहीं था. बग़दाद में दूसरों से सलाह लिए बिना ही नटवर ने जगत और अंदलीब को औपचारिक प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बना दिया. (आउटलुक)


जगत सिंह अब कह रहे हैं कि अंदलीब उनके मित्र ज़रूर हैं लेकिन इराक़ी दौरे पर वे औपचारिक तौर पर उनके साथ नहीं थे. ध्यान देने वाली बात यह है कि अंदलीब और जगत दोनों कॉग्रेस डेलीगेशन का हिस्सा नहीं थे. जगत और अंदलीब अलग-अलग इस दौरे में थे. लेकिन सच यह है कि जहां कॉग्रेस डेलीगेशन ठहरा था बग़दाद की उसी अठारह मंज़िली होटल अल राशिद में ये दोनों भी थे. क्या यह महज़ संयोग है? क्या फिर भी माना जाए कि अंदलीब को इस डील में फ़ायदा पहुंचाने के लिए जगत ने पिता के रसूख का इस्तेमाल नहीं किया?


नटवर सिंह ने माना है कि उन्होंने अंदलीब का इराक़ी अथॉरिटीज़ से परिचय कराया. तीन दफ़ा letter of introduction लिखा गया. लेकिन वे इस बात से इंकार करते हैं कि यह लेटर फ़ूड फॉर ऑयल प्रोग्राम के लिए लिखे गए थे. यह पत्र महज़ सामान्य परिचय था. क्या यह सच नहीं है कि इस लेटर के बाद ही अंदलीब (हमदान एक्सपोर्ट) और आदित्य खन्ना (जगत के चचेरे भाई) को ऑयल वाउचर मिले? जगत सिंह कहते हैं कि उनके मित्र अंदलीब सहगल बिज़नेसमैन हैं और बिज़नेस में प्रॉफ़िट लेना बुरा तो नहीं. किंतु जगत की यह सफ़ाई भी सही नहीं है. दरअसल, अगर यह सही होता तो पॉल वोल्कर पूरे मामले की पड़ताल ही क्यों करते? वोल्कर ने संयुक्त राष्ट्र के कहने पर ही सद्दान हुसैन की regime में ग़ैरक़ानूनी सरचार्ज के इस मामले की तह में जाने का फ़ैसला लिया था. सद्दाम हुसैन को फ़ायदा पहुंचाने वाला सरचार्ज यूएन के रूल का सीधा violation था.

समाचार एजेंसी पीटीआई का कहना है कि रिपोर्ट में कहा गया है कि पैसे मिलने की बात का पता नहीं चल सका. जबकि बीजेपी नेता विजय कुमार मल्होत्रा का कहना है कि "पैसों के सबूत इसलिए नहीं हैं क्योंकि पाठक समिति के पास इसकी जाँच के अधिकार ही नहीं थे." बीजेपी अब सीबीआई जांच की मांग कर रही है.


आदित्य खन्ना जो जगत सिंह के चचेरे भाई हैं. लंदन में बिजनेस करते हैं. इन पर भी ईडी का फंदा कसा. पाठक पैनल ने इन्हें भी अंदलीब सहगल के साथ कमीशन ($ 1 Lac 46 thousand) का दोषी क़रार दिया है. ईडी को दिए गए लिखित बयान में आदित्य खन्ना ने सौदे के बारे में घटनाओं का जो सिलसिलेवार ब्यौरा दिया है. उससे यह ज़ाहिर होता है कि वे जगत सिंह की मदद के लिए क़रार के वित्तीय पहलुओं को संभालने और मेज़फ़ील्ड के साथ तालमेल बिठाने के लिए राज़ी हुए थे. एक तरह से खन्ना तेल के इस खेल में Liaising कर रहे थे.

कुछ सवाल
तेल के इस खेल में पाठक कमेटी की जांच के दायरे में सिर्फ़ नटवर-जगत और उनके साथियों के नामों को ही क्यों निशाना बनाया गया? जबकि कॉग्रेस को भी वोल्कर रिपोर्ट में बेनेफ़िशयरी बताया गया था. कॉगेस को क्लीन चिट देने का क्या मतलब है? जैसा कि जगत सिंह का कहना है कि कुछ कॉग्रेसी हमें फंसाने की कोशिश कर रहे हैं.


जगत सिंह का कहना है कि ईडी के कुछ ऑफ़िशियल्स फ़ाइनेंस मिनिस्ट्री के इशारे पर सिर्फ़ नटवर-जगत सिंह को ही टारगेट कर रहे हैं. यानी जगत सिंह खुले तौर पर वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं. शुक्रवार को जगत सिंह ने संकेत भी दिए कि कपिल सिब्बल के दो लीगल एसोसिएट्स ने पाठक पैनल को मदद की. इन्हीं में से एक वक़ील की पत्नी मीडिया में काम करती हैं. जिसके ज़रिए ईडी के दस्तावेज और पाठक पैनल की रिपोर्ट की ख़बरें चैनल-सेवन और आईबीएन पर दिखाई गईं.

जिस तरीक़े से पहले भी ईडी के दस्तावेज और proceedings के फ़ैक्ट मीडिया तक पहुंचे. गुरूवार को भी पाठक पैनल ने जब अपनी रिपोर्ट पीएमओ को दी तो इस रिपोर्ट के कुछ तथ्य मीडिया तक पहुंच चुके थे. रिपोर्ट का आते ही मीडिया में लीक हो जाना क्या संकेत देता है? दूसरी ओर जस्टिस पाठक का कहना है कि रिपोर्ट उनके कार्यालय से लीक नहीं हुई. क्या पीएमओ भी नटवर सिंह के ख़िलाफ़ चल रही इस साज़िश में शामिल है? क्या चिदम्बरम या फ़ाइनेंस मिनिस्ट्री की पहुंच पीएमओ की फ़ाइलों तक है? या किसी जासूस ने यह ख़बर मीडिया तक पहुंचाई. क्या जसवंत सिंह की पुस्तक की तर्ज पर पीएमओ में कोई mole ऐसी साज़िशों को अंजाम दे सकता है? क्या यह अमेरिकी ष‍डयंत्र है जिसके बारे में वामपंथी यह हवाला दे रहे हैं कि विदेश मंत्री के पद से नटवर सिंह की छुट्टी कराना ही इस षडयंत्र का हिस्सा था. विदित है कि नटवर खुले तौर पर विएना बैठक में ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिकी प्रस्ताव पर भारत के समर्थन के विरोधी थे. दिलचस्प यह भी है कि इस रिपोर्ट को कई देशों ने कूड़ेदान में डाल दिया है. लेकिन भारत में पूरा मामला सिर्फ़ वोल्कर बनाम नटवर बनता दिख रहा है. इन सवालों के जवाब सरकार को तब देने पड़ेगे जब प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पर बहस होगी.

पिछले साल जब पहले-पहल वोल्कर रिपोर्ट पर देश में हल्ला मचा था. तब नटवर के इस्तीफ़े की मांग बीजेपी ने की थी. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नटवर का शुरू में बचाव किया था. बाद में नटवर इस्तीफ़ा नहीं देने पर अड़े और महीनेभर तक बिना पोर्टफ़ोलियो के मंत्री बने रहे. अंततः इस्तीफ़ा दे दिया. अब बीजेपी नटवर सिंह के साथ नज़र आ रही है और कॉग्रेस नटवर के ख़िलाफ़ है. धन्य है राजनीति.

अब ज़रा सबसे अहम सवाल पर नज़र डालें. तेल के इस खेल में यदि कुछ ग़लत हुआ भी है तो सद्दाम हुसैन सरकार को ग़ैरक़ानूनी (संरा की नज़र में) सरचार्ज देने वाली चौबीस सौ कंपनियां भी दोषी हैं. इनमें भारत की 129 कंपनियां हैं. जिनमें रिलायंस, टाटा इंजीनियरिंग, गोदरेज, अजन्ता फ़ार्मा, अलेम्बिक केमीकल्स, किर्लोस्कर वगैरह. चौंकाने वाला तथ्य यह है कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) इस पहलू पर मौन है. हैरानगी यह है कि इस पूरे मामले के राजनीतिक पक्ष पर आरोप-प्रत्यारोप तो मीडिया में छाए रहे लेकिन भारत की इन कंपनियों की जांच के सवाल पर ना सिर्फ़ जांच एजंसियां हाथ बांधे खड़ी हैं बल्कि मीडिया भी बहुत हद तक मौन है.

मीडिया आज इस तेल के खेल के राजनीतिक पहलू पर ज़्यादा चर्चा कर रहा है. मसलन, नटवर का अगला क़दम क्या होगा? क्या वे कॉग्रेस का राज़फ़ाश करेंगे? क्या नटवर समाजवादी पार्टी ज्वाइन करेंगे? दरअसल, मामले के तकनीकी पहलुओं पर जाने में मीडिया को कुछ असुविधा होती है. इस तर्क पर भी विचार किया जाना चाहिए कि कैसे कुछ कंपनियों के काले कारनामे (बशर्ते नटवर सिंह ने ग़लत किया) को उजागर करने का साहस किसी मीडिया ग्रुप में नहीं होता.

इन बातों पर कोई ग़ौर करेगा- क्या सरचार्ज देकर तेल बटोरने वाली भारतीय कंपनियों के ख़िलाफ़ प्रवर्तन निदेशालय कोई कार्रवाई करेगा? क्या दूसरे देशों ने वोल्कर रिपोर्ट के साथ जो बर्ताव किया है वह भारत को भी करना चाहिए?

क्यों हूं मैं मीडिया में ?

वे आठ कारण जिनकी वजह से मैं मीडिया में हूं-

मैं नींद से नफ़रत करता हूं.
मैं ज़िंदगी के मज़े ले चुका हूं.
मैं बिना तनाव लिए जी नहीं सकता.
मैं अपने पापों का प्रायश्चित करना चाहता हूं.
मैं गीता पर विश्वास रखता हूं- कर्म करो लेकिन फल जाए भाड़ में.
मैं इस तर्क को झुठलाना चाहता हूं कि ज़िंदगी में हरेक चीज़ का मकसद होता है.
मैं अपने परिवार वालों से बदला लेना चाहता हूं.
मैं अपने दोस्तों से दुश्मनी मोल लेना चाहता हूं.

ज़ाहिर है कि ऐसे में मीडिया में रहने का ख़ामियाज़ा तो भुगतना ही होगा. वो भी ब्रॉडकास्ट मीडिया में. यानी कोढ़ पर खाज.

Tuesday, August 01, 2006

बिना गधों के दिल्ली में कैसा मज़ा?

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ब यह ख़बर अपने सामने आई तो भरोसा करना मुश्किल था. दिल्ली में बस एक गधा? लानत है हम पर.. सैकड़ों बड़े नेताओं से भरी दिल्ली में इस प्रजाति की तादाद में कमी कैसे हो गई. अपन को लगता है कि गधों ने यहां से पलायन कर लिया है. वे शर्मशार है अब इससे ज़्यादा गधाई उनके बस की बात नहीं रही और वे पीछे रह गए. बेचारे गधे हमसे बिछड़ गए. कुछ बरस पहले सुना था कि कौए लुप्त हो रहे हैं. कौओ को गू खाने की आदत होती है. मिठाई और गू के बीच वे गू को ही वरीयता देते थे. अब दिल्ली में कौए भी दिखाई नहीं देते. कौअत्व में वे भी पिछड़ गए. उनके हिस्से का गू कोई और खा जाता है. बेचारे वे भी पलायन कर गए.

इन गधों को कम से कम अपने पूर्वज से सबक लेना था. कृष्णचंदर की लिखी ''गधे की आत्मकथा'' में पढ़ा था कि कैसे इनके परदादा गधे ने पंडित नेहरू का आशीर्वाद पाकर न सिर्फ़ सियासत में अहम मुकाम हासिल किया बल्कि धनी खानदान की सुंदर सलोनी से ब्याह करने का अवसर भी लपेट लिया. वो गधा महान था.. वो परम गधत्व को उपलब्ध हुआ.

सरकारी रपट बताती है कि दिल्ली में बस एक ही गधा बचा है. मुझे गधों पर कभी भरोसा नही रहा अलबत्ता सरकार पर पूरा भरोसा है. कैसे ना करूं? मैं ही तो सरकार को चुनता हूं. गधों को चुनने का अधिकार हमें संविधान ने थोड़ी दिया है. लिहाज़ा में इस रपट पर भरोसा कर रहा हूं. आप इसे पढ़े और तय करें कि सरकार सही है या गधे.

फिर भी पत्रकारिता की खुजली उठी और मामले की तह में जाने का निश्चय किया. आउटलुक पत्रिका वालों से संपर्क करने के बाद मैंने यह पता लगा ही लिया है कि यह गधा संसद मार्ग के आसपास नज़र आता है. किंतु सिर्फ़ सत्र के दौरान. उन्होंने यह भी बताया कि कुछ गधे और भी हो सकते हैं लेकिन सरकार उनकी गारंटी नहीं ले सकती. क्योंकि वे संसद से दूर रहते हैं. तभी तो सरकारी आदेश पर गधगणना (गधों की जनगणना) करने वालों ने आस-पास में ही गिनती करके खानापूर्ति कर ली और रपट बना दी कि बॉस, बस एक ही गधा बचा है. मुझे तो इस गधे में आध्यात्मिक अथवा राजनीतिक उत्कर्ष की संभावनाएं दिखाई दे रही हैं. ये मामूली गधा नहीं होगा. मुझे इस गधे का इंटरव्यू लेना चाहिए. किंतु इसके लिए अच्छी खासी रिसर्च करनी होगी. यह गधा है कोई मनुष्य नहीं जिससे लपककर पूछ लूं कि, ''कैसा लग रहा है आपको? फ़िल्म या पॉलिटिक्स में जाने का कोई इरादा है क्या?'' वगैरह-वगैरह. आपको इस गधे से कोई गंभीर सवाल पूछने की जिज्ञासा हो तो टिप्पणी दीजिएगा.

यहां पढ़े रपट

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