Tuesday, August 01, 2006

बिना गधों के दिल्ली में कैसा मज़ा?

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ब यह ख़बर अपने सामने आई तो भरोसा करना मुश्किल था. दिल्ली में बस एक गधा? लानत है हम पर.. सैकड़ों बड़े नेताओं से भरी दिल्ली में इस प्रजाति की तादाद में कमी कैसे हो गई. अपन को लगता है कि गधों ने यहां से पलायन कर लिया है. वे शर्मशार है अब इससे ज़्यादा गधाई उनके बस की बात नहीं रही और वे पीछे रह गए. बेचारे गधे हमसे बिछड़ गए. कुछ बरस पहले सुना था कि कौए लुप्त हो रहे हैं. कौओ को गू खाने की आदत होती है. मिठाई और गू के बीच वे गू को ही वरीयता देते थे. अब दिल्ली में कौए भी दिखाई नहीं देते. कौअत्व में वे भी पिछड़ गए. उनके हिस्से का गू कोई और खा जाता है. बेचारे वे भी पलायन कर गए.

इन गधों को कम से कम अपने पूर्वज से सबक लेना था. कृष्णचंदर की लिखी ''गधे की आत्मकथा'' में पढ़ा था कि कैसे इनके परदादा गधे ने पंडित नेहरू का आशीर्वाद पाकर न सिर्फ़ सियासत में अहम मुकाम हासिल किया बल्कि धनी खानदान की सुंदर सलोनी से ब्याह करने का अवसर भी लपेट लिया. वो गधा महान था.. वो परम गधत्व को उपलब्ध हुआ.

सरकारी रपट बताती है कि दिल्ली में बस एक ही गधा बचा है. मुझे गधों पर कभी भरोसा नही रहा अलबत्ता सरकार पर पूरा भरोसा है. कैसे ना करूं? मैं ही तो सरकार को चुनता हूं. गधों को चुनने का अधिकार हमें संविधान ने थोड़ी दिया है. लिहाज़ा में इस रपट पर भरोसा कर रहा हूं. आप इसे पढ़े और तय करें कि सरकार सही है या गधे.

फिर भी पत्रकारिता की खुजली उठी और मामले की तह में जाने का निश्चय किया. आउटलुक पत्रिका वालों से संपर्क करने के बाद मैंने यह पता लगा ही लिया है कि यह गधा संसद मार्ग के आसपास नज़र आता है. किंतु सिर्फ़ सत्र के दौरान. उन्होंने यह भी बताया कि कुछ गधे और भी हो सकते हैं लेकिन सरकार उनकी गारंटी नहीं ले सकती. क्योंकि वे संसद से दूर रहते हैं. तभी तो सरकारी आदेश पर गधगणना (गधों की जनगणना) करने वालों ने आस-पास में ही गिनती करके खानापूर्ति कर ली और रपट बना दी कि बॉस, बस एक ही गधा बचा है. मुझे तो इस गधे में आध्यात्मिक अथवा राजनीतिक उत्कर्ष की संभावनाएं दिखाई दे रही हैं. ये मामूली गधा नहीं होगा. मुझे इस गधे का इंटरव्यू लेना चाहिए. किंतु इसके लिए अच्छी खासी रिसर्च करनी होगी. यह गधा है कोई मनुष्य नहीं जिससे लपककर पूछ लूं कि, ''कैसा लग रहा है आपको? फ़िल्म या पॉलिटिक्स में जाने का कोई इरादा है क्या?'' वगैरह-वगैरह. आपको इस गधे से कोई गंभीर सवाल पूछने की जिज्ञासा हो तो टिप्पणी दीजिएगा.

यहां पढ़े रपट

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8 Comments:

Blogger Srijan Shilpi said...

ये भी खूब रही!

12:53 PM  
Blogger ई-छाया said...

बहुत बढिया कटाक्ष किया है

6:16 PM  
Blogger Jagdish Bhatia said...

फिल्मों तक तो ठीक है, राजनीति में पूछोगे तो शायद गधा भी जाने से मना कर देगा।

7:59 PM  
Blogger Jitendra Chaudhary said...

सही है, मजा आ गया। एक बात याद आ गयी।

हमारे इलाके(कानपुर) मे एक निर्दलीय उम्मीदवार खड़ा होता था, वो इलाके के ब्लॉक चुनाव से लेकर राष्ट्रपति के चुनाव तक लड़ा था, नाम था, भगवती प्रसाद दीक्षित 'घोड़े वाला'।उसका चुनाव चिन्ह भी घोड़ा था। वो अपने चुनावी भाषण मे कहता था, जब इतने सारे गधे लोकसभा मे जीत सकते है तो मेरा एक घोड़ा क्यों नही?

10:09 PM  
Blogger Sagar Chand Nahar said...

अधूरी जानकारी है नीरज भाई,
काहे 650 ही गधे बचे हैं, लगभग 525 तो संसद में ही है और देश की विधान सभाओं में कितने है ये आप अच्छी तरह से जानते है।
( अगर में गधों का अपमाण कर रहा हुँ, तो गधे ( संसद व्वाले नहीं, असली) मुझे माफ़ करें।

11:30 PM  
Anonymous Tarun said...

बहुत बढिया कटाक्ष किया है

8:21 AM  
Blogger Raviratlami said...

आप गिनती में हैं कि नहीं?

जब रतलाम में ऐसी गिनती हुई थी तो गधों ने मुझे नहीं गिना था. ऐसी भूल माफ़ी के काबिल नहीं :)

छींटें और बौछारें पर आरएसएस फ़ीड के बारे में एक छोटा सा लेख लिखा है. कृपया देखेंगे कि आपकी समस्या हल हुई या नहीं अन्यथा और विवरण देता हूँ.

9:00 PM  
Blogger DR PRABHAT TANDON said...

[ सागर चन्द नाहर said...
अधूरी जानकारी है नीरज भाई,
काहे 650 ही गधे बचे हैं, लगभग 525 तो संसद में ही है और देश की विधान सभाओं में कितने है ये आप अच्छी तरह से जानते है।]
हा॥हा॥हा सागर भाई कमाल की बात कही आपने। मगर यूपी और बिहार के कर्णधारो को आप गधा कह कर गधे का अपमान कर रहे हैं,यह तो खच्चर से भी गये गुजरे हैं।

5:15 AM  

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