Sunday, August 06, 2006

तेल का खेल- बड़ी मछलियां बच निकलीं

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भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रामस्वरूप पाठक की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंपी. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक पाठक समिति ने अपनी 110 पेज की रिपोर्ट में कहा है कि तेल के बदले अनाज कार्यक्रम के तहत तेल के कूपन दिलाने में नटवर सिंह और उनके बेटे जगत सिंह की भूमिका थी. रिपोर्ट कहती है कि, ''There may not be any money deal associated with them, but for sure they are guilty of misconduct, of misusing their positions''.
हालांकि पाठक समिति की रिपोर्ट के हवाले से टेलीविज़न चैनलों में काफ़ी कुछ कहा जा रहा है लेकिन अभी इस बात की कोई अधिकृत जानकारी नहीं मिल पाई है कि रिपोर्ट में वास्तव में क्या-क्या कहा गया है. पाठक पैनल की रिपोर्ट पर हालांकि officially disclose नहीं हुई है. ख़बरें हैं कि पैनल ने माना है कि नटवर सिंह और जगत सिंह ने इस पूरे ऑयल स्कैम में positions (as senior congress leader and former foreign minister) का misuse किया है.

कैसे-क्या हुआ (संक्षेप में)


  • नवम्बर 2000 में इराक़ के उपराष्ट्रपति रमादान अपने तेल मंत्री के साथ भारत आए, तेल कूपनों पर शुरुआती बातचीत उसी दौर में हुई.

  • पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने अपने नाम से इराक़ का निमंत्रण पत्र हासिल किया और फिर कॉग्रेस नेतृत्व (सोनिया गांधी) से चार सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल को 17 से 24 जनवरी 2001 तक इराक़ भेजने के लिए अनुमति ली. बाद में इसमें नटवर ने जगत और अंदलीब को भी शामिल कर लिया.

  • नटवर सिंह जी के क़रीबी रहे क्रोएशिया के पूर्व राजदूत अनिल माथेरानी का कहना है कि नटवर सिंह ने 2001 के दौरे का इस्तेमाल जगत और सहगल को तेल के बदले अनाज कार्यक्रम में फ़ायदा पहुंचाने के लिए ही किया था. बाद में माथेरानी यह कहकर पलट गए थे कि यह इंडिया टुडे के साथ ऑफ़ द रिकॉर्ड बातचीत थी. (इंडिया टुडे का इंटरव्यू)

  • अक्टूबर 2005 में जारी पॉल वोल्कर रिपोर्ट में कहा गया था कि नटवर और कॉग्रेस पार्टी ने चालीस लाख बैरल तेल हासिल करने के लिए इराक़ में सद्दाम हुसैन सरकार को ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से सरचार्ज दिया और फिर बाद में उस तेल को मुनाफ़े के लिए एक स्विस कंपनी मेसफ़ील्ड एजी के ज़रिए अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में बेच दिया. यह तेल कूपन अंदलीब को मिला जिसने इसी स्विस कंपनी को बेचा.


पाठक पैनल की रिपोर्ट पर नटवर-जगत की सफ़ाई
जगत और नटवर सिंह कहते हैं कि पाठक पैनल का यह कहना कि Position का misuse किया गया था जबकि वे उस दौर में नटवर ना तो सरकार में थे और ना ही जगत सिंह विधायक थे. लेकिन यह तो सभी मानते हैं कि नटवर सिंह अनुभवी विदेश मंत्री रहे हैं. वे कॉग्रेस के वरिष्ठतम सदस्यों में से हैं. गांधी परिवार के नज़दीकी रहे हैं. सद्दाम हुसैन से नज़दीकी रिश्ते रहे हैं. वे खुले तौर पर अमेरिका विरोधी बयान भी देते रहे हैं. आज नटवर इस पूरे मामले को अमेरिका की साज़िश भी क़रार देते हैं. यानी नटवर की शख़्सियत इतनी तो है कि बिना मंत्री होते हुए भी वे डील को अंजाम तक पहुंचा सकते थे.

जगत सिंह ने मामले का खुलासा होते ही कहा था कि वे कॉग्रेस डेलीगेशन का हिस्सा थे. लेकिन जब रणदीप सुरजेवाला ने खुलासा किया कि जगत सिंह उस डेलीगेशन में नहीं थे तो जगत पलट गए और कहा कि वे नटवर के बेटे के तौर पर वहां थे. इस मामले में माथेरानी कहते हैं कि नटवर सिंह ने इराक़ी न्यौते को अपने बेटे को अपने साथ ले जाने के लिए इस्तेमाल किया क्योंकि उनकी उम्र के किसी शख्स के लिए वहां पहुंचना आसान नहीं था. बग़दाद में दूसरों से सलाह लिए बिना ही नटवर ने जगत और अंदलीब को औपचारिक प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बना दिया. (आउटलुक)


जगत सिंह अब कह रहे हैं कि अंदलीब उनके मित्र ज़रूर हैं लेकिन इराक़ी दौरे पर वे औपचारिक तौर पर उनके साथ नहीं थे. ध्यान देने वाली बात यह है कि अंदलीब और जगत दोनों कॉग्रेस डेलीगेशन का हिस्सा नहीं थे. जगत और अंदलीब अलग-अलग इस दौरे में थे. लेकिन सच यह है कि जहां कॉग्रेस डेलीगेशन ठहरा था बग़दाद की उसी अठारह मंज़िली होटल अल राशिद में ये दोनों भी थे. क्या यह महज़ संयोग है? क्या फिर भी माना जाए कि अंदलीब को इस डील में फ़ायदा पहुंचाने के लिए जगत ने पिता के रसूख का इस्तेमाल नहीं किया?


नटवर सिंह ने माना है कि उन्होंने अंदलीब का इराक़ी अथॉरिटीज़ से परिचय कराया. तीन दफ़ा letter of introduction लिखा गया. लेकिन वे इस बात से इंकार करते हैं कि यह लेटर फ़ूड फॉर ऑयल प्रोग्राम के लिए लिखे गए थे. यह पत्र महज़ सामान्य परिचय था. क्या यह सच नहीं है कि इस लेटर के बाद ही अंदलीब (हमदान एक्सपोर्ट) और आदित्य खन्ना (जगत के चचेरे भाई) को ऑयल वाउचर मिले? जगत सिंह कहते हैं कि उनके मित्र अंदलीब सहगल बिज़नेसमैन हैं और बिज़नेस में प्रॉफ़िट लेना बुरा तो नहीं. किंतु जगत की यह सफ़ाई भी सही नहीं है. दरअसल, अगर यह सही होता तो पॉल वोल्कर पूरे मामले की पड़ताल ही क्यों करते? वोल्कर ने संयुक्त राष्ट्र के कहने पर ही सद्दान हुसैन की regime में ग़ैरक़ानूनी सरचार्ज के इस मामले की तह में जाने का फ़ैसला लिया था. सद्दाम हुसैन को फ़ायदा पहुंचाने वाला सरचार्ज यूएन के रूल का सीधा violation था.

समाचार एजेंसी पीटीआई का कहना है कि रिपोर्ट में कहा गया है कि पैसे मिलने की बात का पता नहीं चल सका. जबकि बीजेपी नेता विजय कुमार मल्होत्रा का कहना है कि "पैसों के सबूत इसलिए नहीं हैं क्योंकि पाठक समिति के पास इसकी जाँच के अधिकार ही नहीं थे." बीजेपी अब सीबीआई जांच की मांग कर रही है.


आदित्य खन्ना जो जगत सिंह के चचेरे भाई हैं. लंदन में बिजनेस करते हैं. इन पर भी ईडी का फंदा कसा. पाठक पैनल ने इन्हें भी अंदलीब सहगल के साथ कमीशन ($ 1 Lac 46 thousand) का दोषी क़रार दिया है. ईडी को दिए गए लिखित बयान में आदित्य खन्ना ने सौदे के बारे में घटनाओं का जो सिलसिलेवार ब्यौरा दिया है. उससे यह ज़ाहिर होता है कि वे जगत सिंह की मदद के लिए क़रार के वित्तीय पहलुओं को संभालने और मेज़फ़ील्ड के साथ तालमेल बिठाने के लिए राज़ी हुए थे. एक तरह से खन्ना तेल के इस खेल में Liaising कर रहे थे.

कुछ सवाल
तेल के इस खेल में पाठक कमेटी की जांच के दायरे में सिर्फ़ नटवर-जगत और उनके साथियों के नामों को ही क्यों निशाना बनाया गया? जबकि कॉग्रेस को भी वोल्कर रिपोर्ट में बेनेफ़िशयरी बताया गया था. कॉगेस को क्लीन चिट देने का क्या मतलब है? जैसा कि जगत सिंह का कहना है कि कुछ कॉग्रेसी हमें फंसाने की कोशिश कर रहे हैं.


जगत सिंह का कहना है कि ईडी के कुछ ऑफ़िशियल्स फ़ाइनेंस मिनिस्ट्री के इशारे पर सिर्फ़ नटवर-जगत सिंह को ही टारगेट कर रहे हैं. यानी जगत सिंह खुले तौर पर वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं. शुक्रवार को जगत सिंह ने संकेत भी दिए कि कपिल सिब्बल के दो लीगल एसोसिएट्स ने पाठक पैनल को मदद की. इन्हीं में से एक वक़ील की पत्नी मीडिया में काम करती हैं. जिसके ज़रिए ईडी के दस्तावेज और पाठक पैनल की रिपोर्ट की ख़बरें चैनल-सेवन और आईबीएन पर दिखाई गईं.

जिस तरीक़े से पहले भी ईडी के दस्तावेज और proceedings के फ़ैक्ट मीडिया तक पहुंचे. गुरूवार को भी पाठक पैनल ने जब अपनी रिपोर्ट पीएमओ को दी तो इस रिपोर्ट के कुछ तथ्य मीडिया तक पहुंच चुके थे. रिपोर्ट का आते ही मीडिया में लीक हो जाना क्या संकेत देता है? दूसरी ओर जस्टिस पाठक का कहना है कि रिपोर्ट उनके कार्यालय से लीक नहीं हुई. क्या पीएमओ भी नटवर सिंह के ख़िलाफ़ चल रही इस साज़िश में शामिल है? क्या चिदम्बरम या फ़ाइनेंस मिनिस्ट्री की पहुंच पीएमओ की फ़ाइलों तक है? या किसी जासूस ने यह ख़बर मीडिया तक पहुंचाई. क्या जसवंत सिंह की पुस्तक की तर्ज पर पीएमओ में कोई mole ऐसी साज़िशों को अंजाम दे सकता है? क्या यह अमेरिकी ष‍डयंत्र है जिसके बारे में वामपंथी यह हवाला दे रहे हैं कि विदेश मंत्री के पद से नटवर सिंह की छुट्टी कराना ही इस षडयंत्र का हिस्सा था. विदित है कि नटवर खुले तौर पर विएना बैठक में ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिकी प्रस्ताव पर भारत के समर्थन के विरोधी थे. दिलचस्प यह भी है कि इस रिपोर्ट को कई देशों ने कूड़ेदान में डाल दिया है. लेकिन भारत में पूरा मामला सिर्फ़ वोल्कर बनाम नटवर बनता दिख रहा है. इन सवालों के जवाब सरकार को तब देने पड़ेगे जब प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पर बहस होगी.

पिछले साल जब पहले-पहल वोल्कर रिपोर्ट पर देश में हल्ला मचा था. तब नटवर के इस्तीफ़े की मांग बीजेपी ने की थी. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नटवर का शुरू में बचाव किया था. बाद में नटवर इस्तीफ़ा नहीं देने पर अड़े और महीनेभर तक बिना पोर्टफ़ोलियो के मंत्री बने रहे. अंततः इस्तीफ़ा दे दिया. अब बीजेपी नटवर सिंह के साथ नज़र आ रही है और कॉग्रेस नटवर के ख़िलाफ़ है. धन्य है राजनीति.

अब ज़रा सबसे अहम सवाल पर नज़र डालें. तेल के इस खेल में यदि कुछ ग़लत हुआ भी है तो सद्दाम हुसैन सरकार को ग़ैरक़ानूनी (संरा की नज़र में) सरचार्ज देने वाली चौबीस सौ कंपनियां भी दोषी हैं. इनमें भारत की 129 कंपनियां हैं. जिनमें रिलायंस, टाटा इंजीनियरिंग, गोदरेज, अजन्ता फ़ार्मा, अलेम्बिक केमीकल्स, किर्लोस्कर वगैरह. चौंकाने वाला तथ्य यह है कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) इस पहलू पर मौन है. हैरानगी यह है कि इस पूरे मामले के राजनीतिक पक्ष पर आरोप-प्रत्यारोप तो मीडिया में छाए रहे लेकिन भारत की इन कंपनियों की जांच के सवाल पर ना सिर्फ़ जांच एजंसियां हाथ बांधे खड़ी हैं बल्कि मीडिया भी बहुत हद तक मौन है.

मीडिया आज इस तेल के खेल के राजनीतिक पहलू पर ज़्यादा चर्चा कर रहा है. मसलन, नटवर का अगला क़दम क्या होगा? क्या वे कॉग्रेस का राज़फ़ाश करेंगे? क्या नटवर समाजवादी पार्टी ज्वाइन करेंगे? दरअसल, मामले के तकनीकी पहलुओं पर जाने में मीडिया को कुछ असुविधा होती है. इस तर्क पर भी विचार किया जाना चाहिए कि कैसे कुछ कंपनियों के काले कारनामे (बशर्ते नटवर सिंह ने ग़लत किया) को उजागर करने का साहस किसी मीडिया ग्रुप में नहीं होता.

इन बातों पर कोई ग़ौर करेगा- क्या सरचार्ज देकर तेल बटोरने वाली भारतीय कंपनियों के ख़िलाफ़ प्रवर्तन निदेशालय कोई कार्रवाई करेगा? क्या दूसरे देशों ने वोल्कर रिपोर्ट के साथ जो बर्ताव किया है वह भारत को भी करना चाहिए?

6 Comments:

Blogger Srijan Shilpi said...

मीडिया द्वारा अपने कारोबारी स्वार्थ के कारण वास्तविक तथ्यों पर लीपापोती किए जाने की इन नापाक हरकतों के मद्देनजर ब्लॉग जैसे वैकल्पिक मीडिया की अहमियत बढ़ गई है, जहाँ आप जैसे मुखर पत्रकार साफगोई से सचाई के छिपे हुए पहलुओं को उजागर कर सकते हैं।

1:02 PM  
Blogger SHUAIB said...

बहुत बढिया नीरज जीः अपकी हिम्मत की दाद देता हूं के अपके लिखने का अंदाज़ हुत तेज़ है - मेरी दुआ है कि आपका कलम इसी ज़ोर से चले

4:43 AM  
Blogger Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया खुलासा विवरण, बधाई.

5:09 PM  
Blogger ई-छाया said...

बहुत बढिया बधाई

5:32 PM  
Anonymous Anonymous said...

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7:49 PM  
Anonymous Anonymous said...

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4:41 AM  

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