Wednesday, August 09, 2006

अमेरिकी षडयंत्र या गर्दन बचाने की कवायद ?

तेल का खेल- भाग २
टवर सिंह जब अमेरिकी दौरे पर थे, तब उन्होंने इराक़ में सेना भेजने की वक़ालत की थी. जिसकी भारत में ज़बर्दस्त आलोचना हुई. (9 जून 2004) "There is a resolution of the last Parliament on this issue in which we had given our opinion that we were against sending troops to Iraq. Now the situation has changed. There is a resolution unanimously passed in the United Nations and there are Arab members in it. We will look at it very carefully. But I must emphasize that this matter will have to be placed before the government at the highest levels, so it would be premature for me to say aye or nay," he said after a 60-minute meeting with U.S. Secretary of State Colin Powell. He has been criticized by the chief opposition party, the Bharatiya Janata Party for these remarks and for making contradictory statements on India's policy on Pakistan.

बीबीसी केहार्ड टाक प्रोग्राम में नटवर ने भारत की विदेश नीति में बदलाव के संकेत देते हुए यह भी कहा था कि भारत नेपाल को सैन्य सहायता देगा. इस मुद्दे पर अब भी वामपंथी राज़ी नहीं हैं. (जून 2004)

नटवर सिंह के विदेश मंत्री होते हुए भी भारत ने विएना में इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी की बैठक में अमेरिकी प्रस्ताव के समर्थन में और ईरान के ख़िलाफ़ वोट किया था. जिसकी वामदलों ने तीखी आलोचना की थी. बाद में प्रधानमंत्री को लीपापोती करनी पड़ी. (1 अक्टूबर 2005)

नटवर अपनी ही सरकार के मुखिया से यह कह रहे थे कि एटमी क़रार को लेकर देश में अलग-अलग तरह की राय है. और प्रधानमंत्री को संसद में बयान देना चाहिए. उनका कहना था कि, "... my disquiet began on April 5, when Secretary of State Condoleezza Rice testified in the House (US Congress) Select Committee and International Committee.
It may be recalled that Bush, from the day he entered the White House, wanted very close relations with India. This was in contrast to (Bill) Clinton, who pilloried us with sanctions after the nuclear tests. Bush has been consistently positively focussing on India. Americans agreed from July 18 to March this year that Indo-US nuke deal will be reciprocal.
But, difficulties began when Rice in the Select Committee used the word ‘‘unilateral.’’ I wrote to the PM to assuage the misgivings of people, our friends had genuine doubts, a national consensus was important. Even the scientific community and the foreign services are divided...but, Rice went beyond NPT. We had never agreed to that." INDIAN EXPRESS फ़िलहाल बीजेपी और वामदल दोनों इसके ख़िलाफ़ नज़र आ रहे हैं.

क्या नटवर सिंह यह कहना चाहते हैं कि 18 जुलाई के एग्रीमेंट, जिसके नटवर Principal Architect थे- के बाद एग्रीमेंट में बेसिक चेंज किए गए? नटवर सिंह साफ़ बताएं कि 18 जुलाई 2005 के बाद ऐसे क्या compulsions थे कि क़रारनामे में इतने Basic Changes कर दिए गए? Is there a pro-US tilt in foreign policy?

जिस तरह से अमेरिकी सीनेट में सीनेटर कैरी, कॉग्रेसमैन टाम लेंटास, सीनेटर सरबैन्स ने एटमी क़रार को लेकर जो बयान दिए हैं, उनमें क़रारनामे के बारे में परस्पर की बजाए एकपक्षीय शब्द सुनाई दे रहे हैं. क्या यह क़रार कुलमिलाकर भारत की तुलना में अमेरिकी हितों की पूर्ति ‍ज़्यादा करता नज़र आ रहा है?

1 Comments:

Blogger नीरज दीवान said...

मेरी अकेली टिप्पणी अच्छी नहीं लगती भैये. तुम भी यहां एक टिप्पणी छोड़कर मेरा लेख अमर कर दो.. :)

11:41 PM  

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