ऐ ग़म ए दिल क्या करूं
दो महीना पहले जब मैंने टाइम की आवरण कथा पढ़ी तो कुछ भी अप्रत्याशित नहीं लगा. यह माहौल तीन साल पहले देश की एनडीए सरकार ने सरकारी खज़ाने से करोड़ो खर्च कर बनाया था. जिसे बाद की सरकार ने जारी रखा है. पूरा तंत्र इस जाल में फंसा नज़र आता है. चमचमाती कथाएं देखकर उनकी बांझे खिल जाती है जो इंडिया को आगे जाता देखना चाहते हैं. चाहे भारत पीछे छूट जाए. इस तरह के माहौल में भारत में निवेश की संभावनाओं के द्वार पर स्वर्णजड़ित तोरण लटकाया जाता है जहां यह बताने की कोशिश होती है कि भारत अब पिछड़ा नहीं रहा. क्योंकि चंद सरमायेदारो की पूंजी में हो रहा दोगुना- तिगुना इज़ाफ़ा और सरकारी सट्टा बाज़ार का उछाल पूरे देश की माली हालत का थर्मामीटर बन गया है. करोड़पतियों की तादाद में बढ़ोतरी की ख़बरों से हमें सुकून मिलता है. करोड़पतियों की तादाद में तो हम चीन के मुक़ाबिल तेज़ी से बढ़ रहे हैं. पिछले दिनों एक ख़बर छपी थी. अख़बार में थोड़ी-सी जगह मिली थी इसे. ख़बर थी कि चीन में वालमार्ट के २० मॉल्स में काम करने वाले मज़दूर संगठनों को चीन सरकार की मंज़ूरी मिल गई. मैं अपने यहां झांक रहा था. सोच रहा था कि खुली अर्थव्यवस्था के बीच श्रमिक-कामगारों के हितों का संरक्षण कैसे किया जाए. यहां कौन है अपना. जिन्हें आज़माया वे तो खिड़की के बजाए दरवाज़े खोलकर बैठ गए हैं. ख़बर सुनने मिली है कि स्पेशल इकॉनॉमिक ज़ोन में अब सरकार हायर एंड फ़ायर पॉलिसी लाने जा रही है. पिछले साल हुए गुड़गांव लाठी चार्ज की याद आ गई. वहां के मज़दूरों ने भी ऐसे ही किसी संगठन के लिए लेबर ऑफ़िस में दरख्वास्त दायर की थी लेकिन सरकार-कंपनी की सांठगांठ से फ़ाइल अटक गई. मुझे कोफ़्त नहीं कि कौन अपनी तिजोरियां बेहिसाब भर रहा है. तकलीफ़ तो भारी और भयावह असमानता को लेकर होती है. अच्छा होगा कि उनकी सुध लगातार ली जाए जो वंचित हैं. वरना हम किस मुंह से अपने देश को लोककल्याणकारी राज्य कह सकते हैं. बहुत-सी बातें हैं जो दिल करता है कहूं या आपसे सुनूं. फ़िलहाल इतना ही दोहरा सकता हूं जो मजाज़ लखनवी (असरार उल हक़) कह गए हैं....
शहर की रात और मैं नाशाद-ओ-नाकारा फिरूं
जगमगाती जागती सडकों पे आवारा फिरूं
ग़ैर की बस्ती है कब तक दर-बदर मारा फिरूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
झिलमिलाते क़ुमक़ुमों की राह में ज़ंजीर सी
रात के हाथों में दिन की मोहनी तस्वीर सी
मेरे सीने पर मगर दहकी हुई शमशीर सी
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
ये रुपहली छांव ये आकाश पर तारों का जाल
जैसे सूफ़ी का तस्व्वुर जैसे आशिक़ का ख़्याल
आह लेकिन कौन जाने कौन समझे जी का हाल
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
फिर वो टूटा इक सितारा, फिर वो छूटी फुलझड़ी
जाने किसकी गोद में आई ये मोती की लड़ी
हूक-सी सीने में उट्ठी, चोट-सी दिल पर पड़ी
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
रात हंस हंसके ये कहती है कि मैख़ाने में चल
फिर किसी शाहनाज़े-लाला-रुख़ के काशाने में चल
ये नहीं मुमकिन तो फिर ऐ दोस्त वीराने में चल
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
हर तरफ़ है बिखरी हुई रंगीनियां रानाइयां
हर क़दम पर इशरतें लेती हुई अंगडाइयां
बढ रही है गोद फैलाए हुए रुसवाइयां
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
रास्ते में रुक के दम ले लूं मेरी आदत नहीं
लौटकर वापस चला जाउं मेरी फ़ितरत नहीं
और कोई हमनवां मिल जाए ये क़िस्मत नहीं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
मुन्तज़िर है एक तूफ़ाने-बला मेरे लिए
अब भी जाने कितने दरवाज़े हैं वा मेरे लिए
पर मुसीबत है मेरा अहदे-वफ़ा मेरे लिए
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
जी में आता है अब अहदे-वफ़ा भी तोड़ दूं
उनको पा सकता हूं मैं, ये आसरा भी छोड़ दूं
हां मुनासिब है, ये ज़ंजीरे-हवा भी तोड़ दूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
इक महल की आड से निकला वो पीला माहताब
जैसे मुल्ला का अमामा जैसे बनिए की किताब
जैसे मुफ़लिस की जवानी जैसे बेवा का शबाब
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
दिल में इक शोला भड़क उठा है, आख़िर क्या करूं
मेरा पैमाना छलक उठा है, आख़िर क्या करूं
ज़ख्म सीने में महक उठा है, आख़िर क्या करूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
जी में आता है ये मुर्दा चांद तारे नोच लूं
इस किनारे नोच लूं और उस किनारे नोच लूं
एक दो का ज़िक्र क्या सारे के सारे नोच लूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
मुफ़लिसी और ये मज़ाहिर हैं नज़र के सामने
सैकडों चंगेज़ो नादिर हैं नज़र के सामने
सैकडों सुलतानो जाबिर हैं नज़र के सामने
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
बढ के इस इन्द्रसभा का साज़ ओ सामां फूंक दूं
इस का गुलशन फूंक दूं उसका शबिस्तां फूंक दूं
तखते सुलतान क्या मैं सारा क़स्र ए सुलतान फूंक दूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं, ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
मायने - नाशादो-नाकारा-उदास और बेकार, क़ुमक़ुम- बिजली की बत्ती, शमशीर- तलवार, तसव्वुर- अनुध्यान, मैखाना- मधुशाला, शहनाज़े लाला रुख़- लाल फूल जैसे मुखड़े वाली, काशाने- मकान, इशरत- सुखभोग, फ़ितरत- स्वभाव या प्रकृति, हमनवा- साथी, तूफ़ाने-बला- विपत्तियों का तूफ़ान, वा- खुले हुए, अहदे-वफ़ा- प्रेम निभाने की प्रतिज्ञा, माहताब-चांद, अमामा- पगड़ी, मुफ़लिस- ग़रीब, शबाब- यौवन, मज़ाहिर- दृश्य, सुल्ताने जाबिर- अत्याचारी बादशाह, शबिस्तां- शयनागार, क़स्रे सुल्तान- शाही महल
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10 Comments:
Diljale ho Neeraj Ji, sab taraf jashne azadi ka daur hai aur aap is qadar ro rahe ho. theek bhi hai. bahut kuch karna hai desh ko abhi bahut sare logo ke liye.
Suresh Pandey
Noida
क़लम के सिपाही जी क्यों दुःखी होते हो? आपको 59 वां आज़ादी वर्ष और साथ मे छुट्टी की बधाई
यह सच है, आज भी इन जश्न के तंबू कनातों के आर पार देखो, असलियत आ जायेगी सामने।
बहुत मौके से मजाज़ लखनवी साहब की रचना लाये हैं.खैर इतनी सारी सच्चाइयों के बीच कुछ अच्छाइयां भी हैं, उन्ही पर नजर करते हुये:
आपको स्वतंत्रता दिवस की बहुत बहुत मुबारकबाद.
समीर लाल
आजादी की जश्न के बीच वास्तविकता को नजरअंदाज भी नहीं किया जाना चाहिए.
परंतु देश के राजनेता तो बस, तात्कालिक चुनावी रणनीति पर ही काम करते हैं - देश के सुदीर्घ भविष्य की नहीं.
बहुत अच्छा लेख।
स्वतंत्रता दिवस की खुशी में सच्चाई को नहीं भूलना चाहिए।
स्वतंत्रता का अर्थ होता हैं आपको अपनी योग्यता के अनुसार बिना किसी भेदभाव के विकास करने की आजादी.
सरकार के भरोसे बैठना भी नालायकी हैं.
कुछ गरीब ऐसे भी देखे हैं जिनके बच्चो को दुध नहीं मिलता पर शामें दारूबाजी में गुजरती हैं.
कई ऐसे आदर्श व्यक्ति भी देखे जो फुटपाथ से बंगले तक का सफर तय किया जिवन भर महेनत कर के.
अपना तथा देश का भविष्य हमारे अपने हाथो में हैं.
सही कहा नीरज भाई।
अमीर और गरीब का फर्क और बढ रहा है। अमीर और अमीर हुए जा रहे है, गरीब और गरीब।
अन्धेरे मे छिपी खबरों के लिए धन्यवाद। आशा है आप लगातार इन खबरों पर रोशनी की किरणे डालते रहेंगे।
कमाल लिखा है नीरज भाई आपने!!
एक बार फ़िर मेरे भावों को आपने शब्द दिये हैं। और आपकी इस प्रविष्टी के समर्थन में यह पोष्ट लिखी है।
http://nahar.wordpress.com/2006/08/15/swatantrata/
'स्वराज' तो आया पर 'सुराज' कहां आया नीरज भाई . अब लोग चाहे मुझे निराशावादी कहें पर उदारीकरण और खुली अर्थव्यवस्था के कीर्तन और जयजयकारे के साथ जो भूमंडलीकरण हो रहा है उसमें तो आर्थिक असमानता और वैषम्य के और अधिक बढ़ने के ही खतरे सामने हैं . आशा का दीप कैसे जगाऊं .
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